सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – ७)


अ. घरके नलके जलसे स्नान करनेकी अपेक्षा नैसर्गिक जलस्रोतमें स्नान करना आध्यात्मिक दृष्टिसे अधिक पोषक होता है अतः हमारी संस्कृतिमें घर-घरमें कुआं हुआ करता था या प्रत्येक ग्राममें तडाग (तालाब) हुआ करता था जहां सभी आनन्दपूर्वक स्नान किया करते थे।
आजके समयमें यदि यह सम्भव न हो तो जब भी समय मिले तो कुंआ, तडाग, नदी, सागर इत्यादिमें अवश्य ही स्नान करना चाहिए। विशेषकर यदि आपके पास यह सुविधा सहज उपलब्ध हो तो व्रत-त्योहारके दिवस अवश्य ही नैसर्गिक जलस्रोतमें जलसे स्नान करनेका प्रयास करें ! सबसे अधिक दुःख मुझे तब हुआ जब मैं भारतके ग्रामीण भागोंमें गई और पाया कि वहां भी लोग वर्षों पुराने कुओंको मिट्टीसे ढक रहे हैं और नलीसे (पाइपसे) आनेवाले टोटीवाले जलसे स्नान कर गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। जबकि अनेक स्थानोंपर उस नलके जलके पाइप, गन्दी नालियोंकी पाससे होकर बहते हैं, यह भी उन्हें दिखाई देता है और कई बार पाइपके क्षतिग्रस्त होनेसे प्रदूषित जल उस पाइपवाले जलमें मिश्रित हो जाता है।
आ. स्नान करनेके पश्चात् सूर्यनमस्कार, सूर्यको अर्घ्य देना तथा वास्तु शुद्धि कर नित्य पूजाकर, नामजप करनेसे सात्त्विकतामें शीघ्रतासे वृद्धि होती है। स्नान, ब्रह्म मुहूर्तके पश्चात् हम जितनी शीघ्र करते हुए यह सब करेंगे, हमें इन कृतियोंसे उतना ही अधिक लाभ प्राप्त होगा।
अब आपको समझमें आ रहा है कि किसप्रकार हम प्रातःकालसे अपनी दिनचर्यामें तमोगुण बढाते रहते हैं और तत्पशचात् कष्ट होनेके कारण दु:खी होते हैं। तमोगुणकी वृद्धि होनेसे मन एवं बुद्धिपर इतना आवरण आ जाता है कि इन्द्रियां विषय-वासनाओंकी दासी बन जाती हैं। जब व्यक्ति सोता है तो उसके लिए सहज उठना सम्भव नहीं होता। व्यक्ति यूं ही निश्चेष्ट, निष्क्रिय और शवके समान पडा रहता है। तमोगुणका मुख्य लक्षण है जडता या निष्क्रियता। वृत्ति आलसी हो जानेके कारण सात्त्विक कार्य, जैसे – धर्माचरण, पूजा, नामजप सत्सेवा जैसी साधना इत्यादि करनेकी इच्छा समाप्त हो जाती है। मनमें नकारात्मक विचारोंका प्रवाह बढ जानेके कारण मनमें षड्रिपु सदैव प्रबल रहते हैं, जिससे अनेक मानसिक रोगोंसे मन ग्रसित हो जाता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थी होता है, वह मात्र अपने या अधिकसे अधिक अपने परिवारके सुख-भोग हेतु अयोग्य रीतिसे या अधर्म कर, धन अर्जित करनेमें लिप्त रहता है – तनुजा ठाकुर  (क्रमश:)



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