हम हिन्दू पर्व-त्यौहारोंपर या शुभ अवसरोंपर नूतन (नए) वस्त्र धारण करते हैं क्योंकि नूतन वस्त्रोंसे सात्त्विक स्पन्दन आनेके कारण उनमें देवताके तत्त्वको आकृष्ट करनेकी क्षमता होती है। फटे हुए वस्त्रोंसे तमोगुणके स्पन्दन आते हैं इसीलिए उसका हम परित्याग करते हैं किन्तु आजके हिन्दुओंकी विवेकशून्यता देख कर हंसी आती है जब वे मात्र मलेच्छोंकी पैशाचिक संस्कृतिका अन्धा अनुकरण करने हेतु शुभ अवसरोंपर भी फटे हुए वस्त्र (जींस, टीशर्ट इत्यादि) धारण कर अपने तमोगुणको बढाते हैं और इसे वे मूर्ख समान, ऊंचे मूल्योंपर क्रय कर धारण करनेमें गर्व अनुभव करते हैं !
हिन्दुओंके इस बौद्धिक पतनको देखकर लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब वे मात्र पाश्चात्योंका अन्धा अनुकरण करने हेतु नग्न होकर सर्वत्र घूमनेमें गर्व अनुभव करने लगें ! सत्य ही है, धर्मविहीन समाज विवेकशून्य, नीतिशून्य एवं संस्कारहीन होकर पशुताकी और अग्रसर होता है ! इससे ही धर्मका क्या महत्त्व कितना अधिक है, यह समझमें आता है – तनुजा ठाकुर (४.८.२०१६)
Leave a Reply