एक व्यक्तिका पत्र आया है -“आप इस प्रकार काम वासना संबन्धित उद्बोधनात्मक लेख न डालें, इससे आपकी आध्यात्मिक छवि धूमिल हो जाएगी ! ”
इसका उत्तर इसप्रकार है – शासन तो सबको लैंगिक शिक्षा (सेक्स एडुकेशन) दे रही है, लिव- इन रिलेशनशिप, गे रिलेशनशिपको मान्यता दे रही है, प्रसार माध्यम(मीडिया) मनरंजनके नामपर अश्लील चित्र, साहित्य एवं चित्रपट (सॉफ्ट पॉर्न) परोस कर अपनी रोटी सेंक रही है ! ऐसेमें इस देशके नागरिक दिशाहीन और भ्रमित है, यदि हम अपने देशवासियोंको योग्य दिशा नहीं देंगे तो कौन देगा ?
धर्मशिक्षणके अंतर्गत इंद्रियोंका नियंत्रित करनेकी विधि भी आती है और इसे सीखाना भी हमारा धर्म है, जी हां, पहले अपने इंद्रियोंपर नियंत्रण करना सीखा है तभी सबको बता रही हूं और रही बात मेरी छविकी तो, यह बलात्कारवाले देशके रूपमें कुप्रसिद्धि पानेवाले भारतको देख मन क्रंदन करता है; अतः यदि मैं एक चरित्रवान भारतकी छवि निर्माण करनेमें अंशमात्र भी योगदान दे पायी तो मैं समझुंगी मेरे जीवन धन्य हो गया। मैंने सदैव ईश्वरको प्रसन्न करने के लिए सर्व कृति की है, समाज क्या कहेगा, इसपर मेरा ध्यान कभी नहीं गया; क्योंकि मुझे पता है मैं सत्यनिष्ठ हूं, धर्मनिष्ठ हूं और मेरा हेतु शुद्ध और सात्त्विक है ! इसीलिए निडरताके साथ जो समाज हित हेतु आवश्यक है वह अवश्य लिखती हूं -तनुजा ठाकुर
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