
एक बार हमारे श्रीगुरुने कहा, “जब तक कोई हमारा अपना नहीं होता है, तो हम उससे मीठा-मीठा बोलते हैं, जब वह हमारा हो जाता है तो हम उसे उसकी चूकें और अहंके लक्षण, सबके समक्ष बताने लगते हैं; जिससे उस जीवात्मामें दोष और अहं नष्ट हो जाए और वह आत्मा प्रकाशी हो पूरे विश्वको ज्योति प्रदान करे !” सन्तोंकी डांटसे हमारे प्रारब्ध जलते हैं, अहं नष्ट होता है और आनन्दकी प्राप्ति होती है ! -पूज्या तनुजा ठाकुर
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