आध्यात्मिक प्रगति द्रुत गतिसे हो इस हेतु हमारा व्यक्तिनिष्ठ नहीं अपितु तत्त्वनिष्ट होना आवश्यक है ।
वर्ष २००० में एक जिज्ञासु प्रवृत्तिके दंपती साधना करने लगे । वे संभ्रांत वर्गसे हैं, अतः उनका घर भी बडा है । मैंने उन्हें तत्त्वनिष्ठ होनेके लिए अनेक बार बताया परंतु वे सदैव व्यक्तिनिष्ठ रहे परिणाम यह है कि आज तक उनकी प्रगति जितनी होनी चाहिए उतनी हुई नहीं । जब भी मैं उन्हें कहती कि हमारे कोई ज्येष्ठ साधका आनेवाले है वे अपने घरमें उन्हें रुकवानेके लिए तुरंत हामी भर देते परंतु जब मैं उन्हें कोई सामान्य साधकके आने की सूचना देते तो वे तुरंत उनकी सेवामें अपनी असमर्थतता जताते ।मैंने उन्हें दो बार उसके बारेमें दृष्टिकोण भी दिये कि सभीमें गुरु तत्त्वको देखनेसे हमारी आध्यात्मिक प्रगति द्रुत गतिसे होती है परंतु उन्होंने मेरी सुनी नहीं ।
एक बार एक साधक जो संत थे वे उनके घर पधारे परंतु वे उस समय सामान्य साधक जैसे ही वर्तन कर रहे थे और अप्रकट रहते थे, मुझे ईश्वर इच्छा अनुसार कुछ भी बतानेकी आज्ञा नहीं थी, मैंने उन्हें उन संतकी एक प्रकारसे तिरस्कार करते हुए उन्हें प्रत्यक्ष देखा; परंतु मैं मौन रही !
साधकों ! व्यक्ति निष्ठ नहीं तत्त्वनिष्ठ बनें, न जाने किस रूपमें ईश्वर आपके पास कब आ जाएं -तनुजा ठाकुर
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