अज्ञानतामें आनन्द है !


विदेशमें रहनेवाले हिन्दू, विदेशकी वस्तुओंकी शुद्धिकी प्रशंसा करते नहीं थकते, मुझे इससे यह समझमें आया कि अज्ञानतामें सचमें आनन्द है ! सात्त्विकताकी परिभाषासे अनभिज्ञ, आजका यह हिन्दू समाज मात्र स्थूल स्तरकी शुद्धिको ही सर्वश्रेष्ठ मापदण्ड मानते हैं, इससे समझमें आता है कि हिन्दुओंका आध्यात्मिक पतन कितने निचले स्तरतक हो गया है ! सत्त्व गुण आधारित हिन्दू संस्कृति और हिन्दुओंकी यह दुर्दशा देख मन क्रन्दन करता है, आजके उच्च शिक्षित हिन्दू आध्यात्मिक रूपसे कितने अज्ञानी हैं और उन्हें अध्यात्मकी शिक्षा प्रथम कक्षासे देनी होगी, इसका भान होता है ! हमारी हिन्दू संस्कृतिमें प्रत्येक सजीव और निर्जीव वस्तुकी शुद्धिका मापदण्ड उसमें स्थित सत्त्व, रज और तम गुणसे होता है इसका अंशमात्र भी ज्ञान, आजके भारतमें या विदेशमें रहनेवाले हिन्दुओंको नहीं रहा, यह हिन्दू धर्मकी सबसे बडी विडम्बना है !



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