जब बबूल बोएंगे तो भविष्यमें उस वृक्षसे आम कहांसे पाएंगे ???


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भारतमें और विदेशमें जहां भी बच्चों एवं युवाओंके लिए संस्कार शिविर लिए वहां मैंने पाया कि उपस्थित शिविरार्थियोंमें से किसीको भी अपने ‘वेद कितने हैं और उनके नाम क्या हैं ?’, यह तक पता नहीं ! ’भगवान श्रीरामका जन्मस्थान कौन सा है ?’, यह भी पता नहीं ! ऐसे जन्म हिन्दू थोडे समय पश्चात् यदि कोई अहिन्दू पंथको अपना ले तो इसमें आश्चर्य कैसा ? अधिकांश हिन्दू माता-पिता अपने बच्चोंको सुसंस्कृत करनेका अंश मात्र भी प्रयास नहीं करते और न ही धर्मशिक्षण देनेका प्रयास करते हैं ! बच्चोंको विदेशी पद्धतिका वस्त्र पहनाना, विदेशी भाषामें बोलनेके लिए प्रोत्साहित करना, विदेशी भोजन कराना, विदेशी नृत्य सिखाना यह सब करनेमें आजके पालक गर्व अनुभव करते हैं और जब यह बच्चे बडे होकर उन्हें भिन्न प्रकारसे प्रताडित करते हैं तो वे अपने बच्चोंको कोसते हैं ! अब जब बबूल बोएंगे तो भविष्यमें उस वृक्षसे आम कहांसे पाएंगे ? ध्यान रहे मात्र वैदिक रूपसे सुसंस्कृत बच्चे ही आपके बारेमें या समाजके बारे विचार करते हैं । विदेशी संस्कृतिमें पले बच्चे स्वार्थी और कुसंस्कारी हो जाते हैं और ऐसेमें वे आपको दुःखी नहीं तो क्या सुखी करेंगे ??? तनुजा ठाकुर


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