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क्यों हैं हमारे श्रीगुरु ‘श्रीकृष्ण स्वरूप’ ? (भाग –२)


भगवान श्रीकृष्णके १०८ नामोंमेंसे एक नाम जगद्गुरु अर्थात ब्रह्मांडके गुरु है। हमारे श्रीगुरु जगद्गुरु कैसे हैं इसे शब्दोंमें बताना अत्यन्त कठिन है किन्तु कुछ उनके कुछ गुण जो उन्हें जगद्गुरु पदपर स्वतः ही आसीन करता है वे इसप्रकार हैं –
आदर्श गुरुके तत्त्व
१. ब्रहमज्ञानी : गुरुका वर्ण और कर्म, ब्राह्मण वर्णवाला होता है । ब्राह्मणकी सर्व विदित परिभाषा है ‘ब्रहम् जानाति ब्राह्मण:’ अर्थात खरे कर्म-ब्राह्मण, ब्रह्मसे साक्षात्कार किए हुए तत्त्ववेता होते हैं; अत: उनमें ईश्वरके साम्य गुण होते हैं । वे उच्चकोटिके सन्तोंसे लेकर सामान्य जनमानसतकको अपनी दिव्यतासे अभिभूत करते हैं ।
२. ब्राह्मणके कर्तव्योंका पालन करना : ब्राह्मणके मूलभूत कर्तव्योंके विषयमें ॠग्वेद अनुसार – ‘ब्रहम जीन्वतत्मुत जिन्वन्तं धियोह्तं रक्षांसि सेधातममीवा:’ अर्थात जो ज्ञान प्राप्त करें, विवेकका सरंक्षण करें एवं समाजमें आसुरी प्रवृतियोंका नाश करें । हमारे गुरु, ऋग्वेदके इस मूल वचनके प्रतिरूप हैं ।
३. ज्ञान देना : जिनसे ज्ञानकी अविरल शाश्वत धारा प्रवाहित हो उसे ज्ञानगुरु कहते हैं, जिनके ज्ञानका न तो कोई आदि हो न अन्त हो,ऐसे ज्ञानगंगाकी प्रतीक स्वरूप गुरुओंके कारण ही सनातन धर्मका ज्ञान, एक अगाध सागर समान है ।
४. धर्म हितार्थ कार्य करना : जो गुरु धर्म एवं शास्त्रोंका ज्ञान एवं अध्यात्मका सूक्ष्म ज्ञान, जिज्ञासु, साधक एवं शिष्योंको योग्य मार्गदर्शन देकर, उन्हें सीखने एवं सिखाने हेतु प्रेरित करते हैं तथा समाजको स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही स्तरोंकी अनिष्ट शक्तियोंसे धर्मका रक्षण करते हैं वे ही धर्मगुरु कहलानेके अधिकारी होते हैं । गुरु ब्रह्मा रूपी धर्मज्ञानकी प्रतिमूर्ति, अधर्मियोंके शिवरूपी संहारक एवं विष्णुरूपी धर्म-संरक्षक होते हैं ।
५. राष्ट्र हितार्थ कार्य करना : यजुर्वेद अनुसार, ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’ अर्थात पुरोहित रूपी आत्मज्ञानी ब्राह्मण धर्मकी ज्योतको राष्ट्रमें प्रज्ज्वलित रखते हेतु संकल्पबद्ध होते हैं । राष्ट्र सरंक्षणका दायित्व भी आत्मज्ञानी गुरुओंपर ही होता है; अतएव जो गुरु, धर्मके ज्ञानका प्रसार करते हुए अपने शिष्यों तथा समाजको धर्मतेजसे युक्त कर राष्ट्र रक्षणका कार्य सातत्यसे कर समाजमें उत्तम लौकिक एवं आध्यात्मिक प्रगति हेतु पूरक व्यवस्था स्थापित करते हैं, वे राष्ट्र गुरु कहलानेके अधिकारी होते हैं । भारत सदैव ही आपातकालमें ऐसे राष्ट्र गुरुओंने नवजीवन प्रदान किया है ।
६. मोक्षकी ओर अग्रसर करना : गुरु मात्र ज्ञान नहीं देते, अपितु शिष्यको स्वयंप्रकाशी बनाते हैं । वे अपने शिष्यको जीवनमुक्त कर, उसे मोक्ष प्राप्तिकी ओर अग्रसर करते हैं । उनके ऐसे शिष्य ही उनके आध्यात्मिक सामर्थ्यका परिचय समाजको देते हैं ।
७. जगतके कल्याण हेतु कार्य करना : हम ‘कृष्णं वन्दे जगद् गुरुं’, कहते हैं; क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण मानव जातिके कल्याण हेतु सर्वकाल हेतु पूरक उपदेश देकर सभीका कल्याण किया । इसी प्रकार जगद्गुरु अनादिकाल तकके लिए मानव जातिके हितार्थ उपदेश देकर जाते हैं ।
उपर्युक्त सभी तत्त्वोंपर यदि आजके कालमें कोई गुरु, जगद्गुरु कहलानेके मापदण्डपर खरे उतरते हैं तो वे हैं हमारे श्रीगुरु, ‘परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले’ ।  ऐसे ब्रहमज्ञानी, तत्त्ववेता, धर्मगुरु, राष्ट्रगुरु, ज्ञानगुरु, मोक्षगुरुरूपी, जगद्गुरुके श्रीचरणोंमें हम नमन करते हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्थाकी भर्त्सना कर, साधकोंसे वर्णानुसार साधना करवाकर ली है । समाजके दुर्जनों एवं दुष्प्रवृत्तियोंके विरुद्ध संग्रामका शंखनाद कर, हिन्दू संगठनका अद्वितीय कार्य सम्पूर्ण भारतमें ही नहीं; अपितु पडोसी राष्ट्रोंमें भी कर रहे हैं । साथ ही सूक्ष्म जगतपर छठी इन्द्रियके माध्यमसे शोध कर समाजको सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंसे होनेवाले कष्टोंसे मात्र रक्षण ही नहीं कर रहे है; अपितु इस विषयमें समाज अपना रक्षण कर, आत्मनिर्भर कैसे बने ?, इस हेतु व्यापक जन–जागरण भिन्न माध्यमोंसे कर रहे हैं ।
सरल एवं वर्तमान कालकी प्रचलित वैज्ञानिक भाषामें अनेक ग्रन्थ संकलित कर, समाजको कलियुगका वेदरूपी ज्ञान दे रहे हैं, जिनमें ऐसा ज्ञान समाहित है, जो आजतक किसी भी ग्रन्थमें उपलब्ध नहीं और उनकी ही संकल्प शक्तिके कारण, यह ज्ञान साधकोंको ईश्वर एवं अन्य भिन्न सूक्ष्म माध्यमसे प्राप्त हो रहा है ।
पश्चात्यवाद एवं आधुनिकीकरणकी अन्धी दौडमें लिप्त धर्मज्ञानसे विमुख हिन्दुओंको धर्मकी ओर प्रवृत कर रहे हैं। सम्पूर्ण राष्ट्रको एक सूत्रमें पिरोने हेतु तथा धर्म संस्थापनाके कार्य हेतु हिन्दू राष्ट्रकी परिकल्पनाको मूर्त स्वरूप दे रहे हैं । एक सहस्रसे अधिक जीवन मुक्त साधकों एवं ६५ से अधिक सन्तोंके एक बडे आध्यात्मिक एवं अलौकिक कुटुम्बका निर्माण कर, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें भारतको धर्मगुरुके रूपमें स्थापित करनेका अलौकिक कार्य कर रहे है । उनके ऐसे अद्वितीय आध्यात्मिक कार्यसे प्रभावित होकर सम्पूर्ण विश्वके अनेक जिज्ञासु एवं साधक अपने जन्मगत पन्थोंके बन्धनको तोड सनातन धर्मकी ओर प्रवृत हो रहे हैं । ऐसे जगद्गुरु रूपी श्रीगुरुके श्रीचरणोंमें, मात्र इतनी विनती करना चाहते हैं –
धन्य हुई पाकर आपकी छत्रछाया ।
अपनी कृपा बनाए रखना, हे गुरुराया ।। (२१.५.२०१७)
(हमारे श्रीगुरुके अलौकिक जीवनचरित्र, शास्त्रशुद्ध लेखन, अध्यात्मिक शोधकार्य एवं अद्वितीय कार्यके विषयमें अधिक जानकारी हेतु इन जालस्थानोंपर अवश्य भेंट दें ।)
www.ssrf.org
www.santan.org
www.hindujagruti.org
www.santanprabhat.org 



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