धर्मधारा


विवेकके नष्ट होनेपर उचित और अनुचितके मध्य भेद करनेकी शक्ति समाप्त हो जाती है और विवेककी जागृति मात्र और मात्र धर्माचरण और साधनासे ही सम्भव है!



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