धर्मधारा


कर्नाटकमें सत्तासीन गठबन्धन दलोंमें मन्त्रालय पाने हेतु घमासान थमनेका नाम नहीं ले रहा है । जैसे घरमें यदि स्वार्थका बोलबाला हो तो वहां क्लेश व्याप्त रहता है, वैसे ही राज्यकर्ताओंमें यदि स्वार्थान्धता हो तो वे स्थिर शासन नहीं दे सकते हैं; क्योंकि उनके लिए स्वहित प्राथमिक होता है एवं राष्ट्र और समाजहित गौण होता है । ऐसे लोग आपसमें ही लडते-झगडते रहते हैं, वे राष्ट्र कल्याणके लिए सोच ही नहीं सकते हैं !



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