दूधको पांच अमृतोंमेंसे एक कहा गया है । हमने अपने माता-पिताको देखा था कि यदि एक बूंद भी दूध कहीं गिर जाता तो उसे त्वरित हाथसे या वस्त्रसे स्वच्छ करते थे जिससे उसमें किसीका पांव न लगे । जब मैं २००८ में गांवमें दो वर्ष रही तो जो भी ग्वाले दूध देने आते थे, यदि उनसे दूधको पात्रमें डालते समय एक बूंद भी दूध गिर जाए तो उसे वे हाथसे स्वच्छ कर देते थे और आजके भारतीय किसानोंकी बुद्धिभ्रष्टताको देखें ! वे दूध जैसे अमृतको शासनके प्रति अपना रोष प्रकट करने हेतु हडतालके नामपर, उसके सैकडों लीटर मार्गपर यूं ही बहाकर व्यर्थ कर रहे हैं ! यह अपनी मांगको रखनेकी क्या कोई पद्धति हो सकती है ? क्या ऐसे किसानपर ईश्वरकी अवकृपा नहीं होगी ? जिस देशमें आज भी २०% व्यक्ति दरिद्रताकी सीमा रेखाके नीचे जीवन यापन कर रहे हैं वहां दूधकी ऐसी अवमानना करना, क्या यह सभ्य समाजको शोभा देता है ! हे भगवान, यह कैसा काल आ चुका है ! इस देशको किसकी कुदृष्टि लग गई है !
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