पवित्रता और स्वच्छतामें बहुत अन्तर होता है । पवित्रता क्या है?, इसे समझने हेतु सूक्ष्म इन्द्रियोंका जागृत होना आवश्यक होता है । जैसे जब मैं विदेश गई तो मैंने देखा वहां अत्यधिक स्वच्छता है; किन्तु पवित्रता कहीं भी अंशमात्र दिखाई नहीं देती थी । वहां ध्यान करते समय मुझे अत्यधिक शक्तिशाली कवच लेना पडता था, अन्यथा अनिष्ट शक्तियां हमारा वलय देखकर गति हेतु ध्यानावस्था भंग करनेका प्रयास करती थीं । वहीं जब मैं व्यष्टि साधना हेतु २००८ से २०१० तक अपने पैतृक गांवमें दो वर्ष रही तो मुझे लगा कि वहां आज लोग स्वच्छता उतनी नहीं रखते हैं । नालियां गन्दगीसे भरी हुई दिखाई देती हैं, वस्त्र भी पैसेके अभावमें उतने स्वच्छ नहीं रहते हैं और एक या दो छोटे कक्षमें वे गाय, बकरी इत्यादिके साथ अत्यधिक अव्यवस्थित रहते हैं, तब भी मुझे ध्यान लगानेमें न कभी अडचन होती थी और न ही अनिष्ट शक्तियां ध्यान भंग कर पाती थीं । इसका कारण है कि ग्रामीण लोग आज भी धर्मभीरु हैं, वे वैदिक सनातन धर्मसे जुडे हुए हैं, वे यथाशक्ति अपनी संस्कृतिका पालन करते हैं; इसलिए जागृति या धनके अभावमें वे अस्वच्छ रह सकते हैं; किन्तु वे विदेशियों समान अनेक दिवस स्नान नहीं करते हों, ऐसा नहीं होता है । वे देर रात जागते नहीं है, वे कर्मठ होते हैं और वे प्रकृतिसे जुडे होते हैं ! वहां भागवत कथा, कीर्तन, पूजा-पाठ आदि होते ही रहते हैं ।
यह है पवित्रता और स्वच्छतामें अन्तर; इसलिए सूक्ष्म इन्द्रियोंको जागृत करनेकी कला सीखनेका प्रयत्न करना चाहिए ! यद्यपि अस्वच्छ रहना अच्छी बात नहीं है; किन्तु मात्र स्वच्छतासे पवित्रता नहीं आती है ! हां, स्वच्छतासे दिव्यता शीघ्र निर्मित की जा सकती है; किन्तु उसे सीखने हेतु योग्य साधना करना अति आवश्यक है ।
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