धर्मधारा


श्री. अजय जैन नामक पाठकने मेरे लेखोंको पढनेपर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि आप हिन्दू धर्मका प्रसार (प्रोत्साहन) देनेके स्थानपर मनुष्य बननेकी सीख क्यों नहीं देती हैं ?
उत्तर बडा सरल है –
तन्तुं तन्वन रजसो भानुमिन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान ।
अनुल्बणं वयत जोगुवामपो  मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् ।। ऋग. १०:५३ ।

इस प्रकार वेद कहता है – मनुर्भव – मनुष्य बनो ! इस्लाम कहता है, मुसलमान बनो, बाइबिल कहता है, ईसाई बनो और बौद्ध कहता है, बौद्ध बनो ! मात्र सनातन धर्म कहता है, मनुष्य बनो !; इसलिए हिन्दू धर्मका प्रसार ही मानवताका प्रसार है ।
इस विश्वमें ऐसा कोई देश बताएं जहांके लोग सुख-शान्ति और भाईचाराके साथ रहते हुए आध्यात्मिक प्रगति कर रहे हों ! जापान जैसे छोटे बौद्ध देशमें जितनी आत्महत्याएं एक वर्षमें होती हैं, उतनी भारत जैसे विशाल देशमें दस वर्षमें नहीं होती हैं ! इस्लामिक देशमें जब कोई और पन्थके लोग नहीं होते हैं तो मुसलमान आपसमें लडने-कटने लगते हैं ! ईसाई देशोंमें इस विश्वको नष्ट करनेवाले सबसे अहितकारी अस्त्र-शस्त्र बनें हैं । दरिद्रता, समलैंगिकता और संस्कारहीनताके कारण आज उनका अस्तित्व संकटमें है ! इसलिए सर्वत्र हिन्दू धर्मका प्रसार ही इस वसुन्धरामें सुख और शान्ति ला सकता है; अतः सभीने हिन्दू धर्मका प्रसार करना चाहिए; क्योंकि मानवीय मूल्योंका रक्षण एवं संवर्धन मात्र और मात्र आर्य वैदिक सनातन हिन्दू धर्म करता है और करनेमें सक्षम है !



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