चित्रपटोंमें यह दिखाया जाता है कि प्रातःकाल उठनेके पश्चात, उसमें अभिनय करनेवाले कलाकार बिना मुख धोए अपनी स्त्री या पत्नी या सेवकके (नौकर उर्दू शब्द है) हाथोंका बना चाय पीते हैं । अधिकांश हिन्दू भी अपने विवेकको ताकपर रख, बिना कुल्ला तक किए उस तमोगुणी विषका पान करते हैं और उसके पश्चात अनेक रोगोंसे ग्रसित होनेका रोना रोते हैं । धर्मविरहित समाज, विवेकशून्य अनुकरणप्रिय बन्दर समान हो जाता है, यह उसका एक ज्वलन्त उदाहरण है !
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