स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया कैसे आरम्भ करें ? (भाग – १)


हमने अभी तक स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया समाजके सभी वर्गोंने क्यों करनी चाहिए ?, यह लेख श्रृंखला आपके समक्ष प्रस्तुत कर ही चुके हैंं; इसके फलस्वरूप अनेक व्यक्तियोंने पूछा है कि वे इस प्रक्रियाको कैसे कर सकते हैं ? इस प्रक्रियाका शुभारम्भ करने हेतु सर्वप्रथम आपको यह स्वीकार करना होगा कि आपके व्यक्तित्वमें स्वभावदोष हैं एवं उन दोषोंका जो प्रकटीकरण चूकोंके रूपमें होता है उसे अपनी दिनचर्यासे ढूंढकर लिखना आरम्भ करना होगा । यदि आप स्वयंकी चूकें ढूंढकर उसे लिख सकते हैं तो इसका अर्थ है कि आपमें अन्तर्मुखता पहलेसे विद्यमान है । यदि आप अपनी दिनचर्यासे चूकें (गलतियां) ढूंढकर नहीं लिख पाते हैं तो आप अपने परिजन, मित्र, सहपाठी या सहसाधकसे इसे पूछकर ले सकते हैं ।
एक सरलसा सिद्धान्त ध्यान रखें आपमें जितने अधिक स्वभावदोष होंगे, आपका अहंकार उतना ही अधिक होगा अर्थात अहंकार और दोषोंका सीधा सम्बन्ध होता है; अतः इस तथ्यको आपको स्वीकार करना होगा । जैसा कि आपको बताया था कि सभीमें षड्रिपु ही होते हैं, सातवां रिपु नहीं होता; और हमारे दोष उन्हींका प्रकटीकरण होते हैं; अतः अपने दोषोंको छिपानेके स्थानपर उसे दूर करनेका प्रयास करें और यह कभी छिप भी नहीं सकता है । आप किसीके साथ दस दिवस रहेंगे तो आपके सभी दोष उसके समक्ष उभर कर स्वतः ही आ जाएंगे; क्योंकि यह आपके व्यक्तित्वका अविभाज्य अंग होता है ।
मात्र चूकें लिखनेसे नहीं होगा, उन चूकोंको दूर करने हेतु योग्य उपाय योजना मनको बतानी पडती है एवं उसमें सातत्य रखना पडता है, ध्यान रखें यह स्वयंके दोषोंके साथ एक आंंतरिक युद्ध होता है । यहींपर हमें किसीका मार्गदर्शन चाहिए होता है । – तनुजा ठाकुर (११.१०.२०१७)



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