संन्यासी क्यों करे स्वाभाव दोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – १)


आपको एक आनन्दकी बात बताती हूं, गुरुकृपासे हमारे लेखोंके वाचकोंमें विद्यार्थीसे लेकर अनेक गुरुओंके माननेवाले भक्त, साधक, सिद्ध, ब्रह्मचारी एवं अनेक संन्यासी भी सम्मिलित हैं; अतः लेखन करते  समय या सत्संग लेते समय मुझे सभी वर्गके पाठक या श्रोताका ध्यान रखना पडता है । यद्यपि स्थूलसे हम उनसे परिचित नहीं हैं, किन्तु सूक्ष्मसे उनका हमसे जुडाव है; अतः समय-समयपर मैं उनके लिए भी लिखती हूं और इतने वृहद  स्तरके पाठक वर्गद्वारा विशेष स्नेह हेतु हम मन:पूर्वक अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं । मैं कोई विदूषी नहीं हूं, जो भी कुछ अपने आस-पास देखा है; या अपने श्रीगुरुसे सीखा है या अनुभव या अनुभूति ली है, उसे ही मात्र ईश्वरीय प्रेरणासे मां सरस्वती शब्दबद्ध करवाती हैं । यह लेख श्रृंखला संन्यासियोंके लिए है ।

संन्यास लेना साधनाका अन्त नहीं अपितु प्रारम्भिक चरण है । जैसे एक विद्यार्थीको किसी बडी शिक्षण संस्थामें प्रवेश पाना हो तो सर्वप्रथम उसे आवेदन पत्र (फॉर्म) भरना पडता है, उसीप्रकार संन्यासकी दीक्षा मात्र ईश्वरको पाने हेतु उस विश्वविद्यालयके प्रवेश पत्र भरने समान है । संन्यासीका व्रत, एक गृहस्थ साधकसे अधिक कठिन होता है; अतः गृहस्थ सन्त भी एक सामान्य संन्यासीको भी अत्यधिक सम्मान देते हैं और देना भी चाहिए ।

संन्यासियोंसे समाजको आदर्श वर्तनकी अपेक्षा होती है, यह इस वर्गने विशेष रूपसे ध्यान रखना चाहिए । समाजको यह ज्ञात नहीं होता कि सभी संन्यासी सन्त नहीं होते; इसलिए वे उनसे आदर्श आचरणकी अपेक्षा रखते हैं ।

संन्यासी तो मात्र ईश्वरप्राप्तिकी अपनी उत्कंठा व्यक्त करने हेतु एक विशिष्ट व्रत लेकर साधनाका प्रयास आरम्भ करते हैं, जिससे उन्हें इस दिशामें शीघ्र सुफल मिले ।

संन्यास धारण करनेवाले साधकने यह सदैव ही ध्यान रखना चाहिए कि यथासम्भव उनका वर्तन आदर्श हो । यद्यपि मुझे ज्ञात है कि यह इतना सरल नहीं; किन्तु संन्यासी वस्त्रकी गरिमाको सदैव बनाए रखना, यह उनका मूल धर्म है ।

संन्यास लेना यह ईश्वरप्राप्तिका एक साधन है, साध्य नहीं; अतः साधन, साधन ही रहे साध्य न बन जाए , यह संन्यास व्रत लेनेवाले साधकने अवश्य ही ध्यान रखना चाहिए । ईश्वरने मुझे तीन बार कुम्भ और महाकुम्भमें सर्वत्र भ्रमण करनेका सौभाग्य दिया है और मैंने ऐसा पाया कि कुछ संन्यासी अपनी जटाओंके प्रदर्शनमें अटक गए, तो कुछ अपने वस्त्र अलंकारमें, तो कुछ विशेष सिद्धियोंमें । जटा धारण करना, साधना हेतु पोषक है, यह तथ्य सत्य है; किन्तु अपनी जटाओंकी देखभालमें सदैव व्यस्त रहना, उसका प्रदर्शन करना, इससे संन्यासीमें लोकेष्णा जागृत होती है और वह साधनापथपर अग्रसर नहीं हो पाता है । उसीप्रकार सिद्धियोंका प्राप्त होना, यह भी साधनाकालमें स्वाभाविक है; किन्तु जिन्हें अपने अहंके प्रदर्शन करनेकी वृत्ति होती है वे सिद्धियोंके मायाजालमें फंस जाते हैं ; अतः अपने ध्येयके प्रति एकनिष्ठ रहने हेतु संन्यासियोंने अपने दोषों एवं अहंके लक्षणोंका निरीक्षण कर, उसे दूर करनेका प्रयास करना चाहिए और इसी प्रक्रियाको दोष निर्मूलन प्रक्रिया कहते हैं । (क्रमश:)

– तनुजा ठाकुर (९.१०.२०१७)



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