इस प्रक्रियाको करने हेतु प्रतिदिन अपनी चूकें (गलतियां) एक अभ्यासपुस्तिकामें लिखें एवं उसे समष्टिमें साझा करें ।
चूकें समष्टिमें साझा करने हेतु भिन्न वर्गके लोग निम्नलिखित प्रयत्न कर सकते हैं –
* जैसे विद्यार्थी अपने विद्यालय या महाविद्यालयके कक्षमें चूक लिखनेवाला फलक (बोर्ड) रख सकते हैं ।
* गृहस्थ अपने घरपर सभी सदस्योंके चूक लिखने हेतु फलक रख सकते हैं ।
* आश्रममें भोजन ग्रहण करनेवाले कक्षमें या विभागमें चूक लिखनेवाला फलक रख सकते हैं, जो चूकें विभागके विशिष्ट कार्यसे सम्बन्धित हुई हों, उन्हें वहीं साझा किया जा सकता है, जो चूक आश्रम स्तरपर हुई हों उसे भोजन ग्रहण करनेवाले कक्षमें लगा सकते हैं; किन्तु यदि विभागसे सम्बन्धित चूकसे गुरुकार्य, धर्मकार्य या समष्टि कार्यको हानि पहुंची हो तो उसे विभाग एवं आश्रम दोनों ही स्तरपर सार्वजनिक करना चाहिए । (आगामी हिन्दू राष्ट्रमें यह पद्धति सर्वत्र देखनेको मिलेगी; अतः जो कल होनेवाला है, उसका शुभारम्भ आजसे ही क्यों न करें ?)
कुछ लोगोंको मेरी ये मेरी बातें अर्थहीन, तर्कहीन एवं असम्भव प्रतीत हो रही होंंगी; किन्तु यह प्रयोग मैंने ‘सनातन’के आश्रममें एवं सनातनके कई साधकोंके घरपर करते हुए देखा है और आज ‘उपासना’के आश्रममें भी यह किया जाता है और यह प्रयोग हमने ‘व्हाट्सएप्प’पर करनेका भी प्रयास किया है, जिसका उत्तम प्रतिसाद मिल रहा है !
तो आइए, आज हम अपनी चूकोंको सार्वजनिक क्यों करना चाहिए ?, इससे क्या लाभ होते हैं ?, यह जान लेते हैं –
१. चूक सार्वजनिक स्तरपर स्वीकार करनेसे प्रामाणिकता एवं विनम्रता, दोनोंमें होती है वृद्धि
अहंकारका प्रमाण जितना अधिक होता है, व्यक्ति उतना ही अधिक आनन्दसे दूर रहता है । विनम्र जीवको सभी प्रेम करते हैं एवं उनसे किसीको कष्ट नहीं होता । अहंकार और विनम्रता ये दो विपरीत भाव हैं । आजके व्यष्टि और समष्टि जीवनमें दुःखका मुख्य कारण अहंकार है । जिसमें अहंकार जितना अधिक होता है, वह उतना ही अप्रामाणिक एवं दोषयुक्त होता है, अर्थात उसके अहंको ठेस न पहुंचे इस हेतु वह सभीके समक्ष अपनी एक स्वच्छ छवि बनाकर रखने हेतु प्रयत्नशील होता है और यह करनेके क्रममें वह अपने दोषोंको छुपानेका व्यर्थ प्रयत्न करता रहता है, व्यर्थ प्रयत्न यह इसलिए कह रही हूं क्योंकि आज नहीं तो कल दोष सभीके समक्ष प्रकट हो ही जाते हैं । अहंकारी व्यक्ति अपनी चूकें सबके समक्ष कभी भी स्वीकार तब तक नहीं करता है जब तक परिस्थिति उसे बाध्य न कर दे । वहीं विनम्र जीव प्रामाणिक होकर अपनी चूकोंको सबके समक्ष सहज होकर स्वीकार कर लेता है । दूसरे शब्दोंमें यह कहा जा सकता है कि अपनी चूकोंको सार्वजनिक करनेसे हमारा अहं न्यून होने लगता है; अतः प्रामाणिक होकर अपनी चूकें सबके समक्ष लिखना चाहिए या बताना चाहिए । जिनमें अहं अधिक होता है, उनके लिए यह प्रक्रिया करना कठिन होता है; ऐसेमें धीरे-धीरे प्रयास करते रहना चाहिए ।
प्रामाणिकता एक ईश्वरीय गुण होनेसे, उस व्यक्तिपर ईश्वरीय कृपा सम्पादित होनी आरम्भ हो जाती है ।
२. चूक स्वीकारनेसे अगले व्यक्तिके मनमें निर्माण हुआ आक्रोश होता है न्यून
जिनके साथ हमारेद्वारा कोई भी अप्रिय प्रसंग निर्माण होता है, उनके मनमें हमारे प्रति आक्रोश, या दुराग्रह निर्माण हो जाता है । उस अप्रिय प्रसंगमें हमसे क्या चूक हुई ?, यह अन्तर्मुखतासे विचार कर लिखनेसे या सार्वजनिक रूपसे बतानेसे या उजागर करनेसे उस व्यक्ति विशेषका हमारे प्रति आग्रह या आक्रोश न्यून हो जाता है । इससे हमारे सम्बन्धमें खटाश या दूरी न्यून होती है एवं अगले व्यक्तिके मनमें यदि कोई प्रतिशोधकी भावना हो तो वह भी न्यून हो जाती है ।
३. स्वयंके मनका बोझ न्यून होना
जब भी किसी व्यक्तिसे कोई बडी चूक हो जाती है तो उसके मनपर उस चूकका बोझ रहता ही है, चूक बतानेसे या स्वीकारनेसे मन हल्का हो जाता है और तनाव भी न्यून हो जाता है।
४. चूक सार्वजनिक रूपसे बतानेसे उससे निर्माण हुए पापकर्मकी घटती है तीव्रता
यह सृष्टि कर्मफलन्याय अनुसार चलती है; अतः जब भी कोई चूक होती है तो उससे पापकर्म निश्चित ही निर्माण होता है, चूक सार्वजनिक रूपसे स्वीकारनेसे उस चूकसे निर्माण हुए पापकर्मकी तीव्रता थोडी न्यून हो जाती है और आत्मग्लानि होती है, जिससे व्यक्ति प्रायश्चित लेनेकी ओर उन्मुख होता है ।
५. सार्वजनिक किए हुए चूकोंसे सीखने हेतु मिलना
सार्वजनिक किए हुए चूकको पढनेसे हमें ऐसी चूकें नहीं करनी चाहिए, यह सीखने हेतु मिलता है और दूसरा व्यक्ति भी हमारी चूकोंसे सीखता है । इसप्रकार यह एक प्रकारसे समष्टि हेतु पोषक उपक्रम बन जाता है ।
६. चूक साझा करनेसे सहायता प्राप्त होना
जब हम चूकें साझा करते हैं तो हमें कोई न कोई उसपर अवश्य ही मार्गदर्शन करता है । इससे पुनः वैसी ही चूक होनेपर क्या करना चाहिए ?, यह हमें ध्यानमें आता है ।
इसप्रकार चूक साझा करना कलियुगमें एक मानसिक यज्ञकर्म है, जिससे हमारा एवं समष्टिका उद्धार होता है और यज्ञका उद्देश्य भी यही होता है ।
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