भिन्न स्वाभावदोषोंको दूर करने हेतु दृष्टिकोण (भाग – ५)


दोष : अनुशासनहीनता अन्तर्गत समयबद्धताका अभाव
एक सुप्रसिद्ध कहावत है चोर-चोर मौसेरे भाई । उसीप्रकार हमारे गुण-दोष होते हैं । एक गुण अपने साथ अनेक गुणोंको आकृष्ट करता है एवं एक दोष अनेक दोषोंको जन्म देता है या अन्य भिन्न दोषोंकी वृद्धिमें सहायक होता है। तो आज हम समयबद्धता इस गुणमें किस प्रकार पूर्व नियोजनकुशलता रुपी गुण महत्त्वपूर्ण है, यह जानेंगे।
यदि किसीको अपने विद्यालय, महाविद्यालय या कार्यालय समयपर जानेकी वृत्ति(आदत) हो तो वह क्या करता है, यह सोचें।  जो भी व्यक्ति समयबद्ध रहते हैं, उनमें अपने कार्यका पूर्वनियोजन करना, यह गुण बहुत सुदृढ होता है। वे प्रातःकाल कार्यालय समयपर जाने हेतु रात्रिमें ही अधिकसे अधिक पुर्वसिद्धता करते हैं। यह बात स्त्रियोंके साथ भी जो अपने रसोईघरमें समयपर भोजन बनाती हैं। जो स्त्रियां समयबद्ध कार्यालयमें जाती हैं, उनका पूर्वनियोजन तो और भी अच्छा होता है, क्योंकि उन्हें घर और बाहर दोनों कार्यमें उचित सामंजस्य रखना  होता है।
समष्टि साधना करनेवाले साधकको भी अपनी व्यष्टि साधनाके साथ समष्टिका नियोजन करना होता है, अतः जिनमें समयबद्धता यह गुण हो, उनकी व्यष्टि-समष्टि दोनों साधना अच्छी होती है, ऐसा मेरा निरिक्षण है। अतः प्रत्येक कृति समयपर हो सके इस हेतु अपने कार्योंका पूर्वनियोजन करना सीखें।  पूर्व नियोजन करते-करते हमारे भीतर भविष्यमें देखनेकी क्षमता भी निर्माण हो जाती है, यह इस गुणकी एक उपलब्धि है, ऐसे लोग अपने जीवनके प्रत्येक क्षेत्रमें सफल होते हैं।
जैसे किसीको योगके वर्गमें जानेमें सदैव देरी होती है क्योंकि जो कार्य प्रातःकाल आठ बजे तक करना होता है, वह उठनेके दो घंटेमें सम्भव नहीं है,  ऐसेमें प्रातःकाल उठनेके पश्चात् उन्होंने स्वयंके द्वारा की जानेवाली कार्योंकी सूची बनानी चाहिए एवं उसमें कितना समय लगता है यह लिखना चाहिए तथा उनमें कौनसे कार्य वे रात्रिमें करके रख सकते हैं या योगवर्गसे आनेके पश्चात् कर सकते हैं इसकी प्राथमिकता निर्धारित करनी चाहिए एवं उसी अनुरूप कृति करनी चाहिए – तनुजा ठाकुर (२८.१२.२०१७)



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