भिन्न स्वाभावदोषोंको दूर करने हेतु दृष्टिकोण (भाग – ७)


दोष : अनुशासनहीनता अन्तर्गत कार्यपद्धतिके पालन करनेका अभाव
प्रत्येक प्रतिष्ठान या कार्यालयकी अपनी कार्यपद्धति होती है, उसे, सम्पूर्ण व्यवस्था सुचारू रूपसे चले, इस हेतु बनाया जाता है ।  भारतमें बाल्यकालसे अनुशासनबद्ध होना नहीं सिखाया जाता है; अतः आज सर्व सामान्य व्यक्तिमें अनुशासनहीनताका प्रमाण बहुत अधिक है ।  आपको यदि मेरी बातपर विश्वास न हो तो किसी भी शासकीय कार्यालयमें जाकर वहांके कार्यालयकी दुर्दशा देख लें, सर्वत्र धूल, पानकी थूक, अस्त-व्यस्त फाइलें, अपने स्थानसे दूर कहीं जाकर टोली बनाकर गप्पें हांकनेवाले कर्मचारीगण, यह आज भारतके शासकीय(सरकारी) कार्यालयकी पहचान है ।
भारतमें मार्गोंपर अनुशासनहीन लोगोंद्वारा यातायातके नियमकी धज्जियां उडाते तो आप सर्वत्र देख सकते हैं ।  आज अनेक लोग अपने बच्चोंको निजी (प्राइवेट) विद्यालयोंमें पढाते हैं, कुकुरमुत्ते समान इन विद्यालयोंका भारत भरमें फैलनेका कारण क्या है, यदि आप इस विषयमें किसीसे भी पूछेंगे तो उनका एक ही उत्तर होगा शासकीय(सरकारी) कार्यालयमें अनुशासहीनता होती है, शिक्षक भी वैसे ही होते हैं और विद्यार्थीको पूरा पाठ्यक्रम योग्य रीतिसे नहीं पढाया जाता है ।
एक अनुशासनहीन व्यक्ति, स्वार्थी, लोभी और कर्तव्यशून्य होता है ।  उसमें दूसरोंका विचार करना, यह गुण होता ही नहीं है, उसे मात्र स्वयंके अधिकार ज्ञात होते हैं, जिस प्रतिष्ठानमें वह कार्य करता है, जहांसे कुछ सीखता है, जिस समाज या राष्ट्रमें रहता है उसके कुछ नियम होते हैं और उसका पालन करना यह उसका धर्म है, यह सामान्य सा मानवीय गुणका आज भारतीयोंमें लोप हो गया है, ऐसे कुसंस्कारी समाज कैसे सुखी और समृद्ध हो सकता है ? ऐसे अनेक लोगोंके कारण ही भारत आज विश्वके भ्रष्टतम देशोंमें गिना जाता है ।  एक साधक प्रवृत्तिका व्यक्ति अपने कर्तव्योंका पालन निष्ठासे करता है और अनुशासनबद्ध रहता है ।
आजके अनुशासनहीन समाजका एक और उदाहरण देते हैं, हम आश्रममें रहते हैं ऐसेमें whatsapp, फेसबुक इत्यादिपर समय व्यर्थ करना एकप्रकारसे पाप ही है तथापि समाजमें धर्मप्रसारके निमित्त हम whatsappका उपयोग कर उसकेद्वारा सभीतक घर बैठे, धर्म और साधनाकी बातें पहुंचाते है, हम धर्मधारा सत्संगके ऑडियो सत्संगके माध्यमसे लोगोंको धर्म और अध्यात्मकी बातें बताते हैं इस हेतु हम अत्यधिक श्रम करते हैं, हमारे सत्संग ऑडियो फाइलके रूपमें होते हैं और वे heavy फाइल्स होते हैं अतः हमने जागृत भव गुटमें कुछ भी सन्देश न भेजनेकी विनती हम श्रोतासे गुटमें जोडनेसे पूर्व ही करते हैं किन्तु हमने पाया कि आजके कृतघ्न, विवेकशून्य व्यक्तियोंके लिए न स्वयंके समयका महत्त्व है और न ही दूसरोंके समयका महत्त्व है और दूसरोंका विचार करना यह गुण तो आजके समाजमें जैसे है ही नहीं; अतः विवश होकर हमें यह नियम बनाना पडा कि नियम पालनके अभावमें हम आपको गुटसे निष्काषित करेंगे ।  मैंने ऐसा पाया है कि धर्मविहीन मनुष्य मात्र दण्डकी भाषा समझते हैं, इसकी प्रत्यक्ष प्रतीति मैंने विदेशोंमें जाकर ली ।  मैंने देखा सभी भारतीय वहां यातायातके नियमोंका अत्यंत कठोरतासे पालन करते हैं, मैंने जब उसका कारण जानना चाहा तो सभी देशोंमें रह रहे भारतीयोंका एक ही उत्तर था यहां नियम भंग करनेपर कठोर अर्थदण्ड(जुर्माना) भरना पडता है । विदेश जानेपर मैंने यह सीख ग्रहण कर ली विवेकशून्य, अनुशासनहीन एवं कर्तव्यशून्य व्यक्तिको मार्गपर लाने हेतु कठोर दण्डका विधान डालना चाहिए ! (३०.१२.२०१७)



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