दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होय॥
अर्थ : दुखमें ईश्वरका स्मरण सहज हो जाता है; परन्तु सुख रहनेपर ईश्वरका स्मरण किंचित ही आता है; अतः कुंतीने भगवान श्रीकृष्णसे कहा था कि मुझे दुख चाहिए, जिससे आपका स्मरण रहे । सुख हमें बहिर्मुख करता है और अनेक बार हमें लगता है कि सुखकी प्राप्ति हमने अपने कर्मठतासे पायी है; परन्तु दुख आनेपर और यदि उसका निराकरण हम न कर पाएं तो दुखके उस प्रसंगसे हम सोचने लगते हैं कि हमें दुख क्यों मिला ?, खरे अर्थोंमें दुख हमें अन्तर्मुख करता है और हम दुखके कारण ढूंढनेपर बाध्य हो जाते हैं । वस्तुत: जो सदैव हरिको भजता है, उसे प्रारब्ध अनुसार दुख मिलनेपर उसे सहनेकी शक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है और दुखकी तीव्रताका भान नहीं होता । ईश्वरके सतत स्मरणसे हम सुख-दुख दोनोंसे ही परे जाते हैं और हमें आनन्दकी प्रतीति होती है । यहां कबीरदासजीके दोहेमें ‘दुख कहे को होय’का आशय आनन्दावस्थासे है; क्योंकि उस अवस्थामें जीवको दुखका बोध नहीं होता । साधना करनेसे दुख नहीं आएगा, ऐसा नहीं है, प्रारब्धकी चक्की एक बार चल जाती है तो जिसके हिस्सेमें जो भोग लिखा है उसे तो भोगना ही पडता है; परन्तु ईश्वरका सुमिरन एक कवच समान प्रतिकूल परिस्थितियोंमें हमारा रक्षण करती है ।
हमारे श्रीगुरुने कहा है, ”दुखी बने जिज्ञासु, जिज्ञासु बने मुमुक्षु और मुमुक्षु बने साधक और साधक प्राप्त करे मोक्ष !” अतः दुख कई बार वरदान सिद्ध होता है ।
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