दुर्घटना सम्भावित क्षेत्रोंसे संबंधित सूक्ष्म जगतके तथ्य !


नवम्बर २०१८ से जब हमने इंदौरके मानपुर ग्राममें उपासनाके आश्रमका निर्माण कार्य आरम्भ किया और इस क्रममें हम इंदौर महानगरसे, जहां हम कुछ समयके लिए भाडेपर एक घर लेकर रह रहे थे, वहांसे निर्माण कार्यके निरीक्षण हेतु जब भी इंदौरसे आगरा-मुम्बई राजमार्गसे मानपुर आते या पुनः लौटते तो प्रत्येक बार, एक वर्षतक, हमें उस मार्गमें कोई न कोई दुर्घटनाग्रस्त वाहन दिखाई देता था । हमें आवश्यकता अनुसार सप्ताहमें कभी दो बार, कभी तीन या चार बार आना-जाना पडता था; किन्तु एक वर्षतक एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि हमने उस मार्गपर कोई नूतन दुर्घटना हुए न देखी हो ! कुछ दुर्घटनाएं तो हमारे समक्ष ही हुई थीं; किन्तु एक वर्ष उपरान्त दुर्घटनाओंका प्रमाण घटने लगा और अब ऐसा नगण्य ही दिखाई देता है ।
   इस मार्गपर जब आरम्भमें मैं कुछ साधकोंके साथ जाती थी और जब हम इंदौर नगरसे १५ किलोमीटर दूर रहते थे, तभी मैं अनियन्त्रित निद्रासे जैसे झूलने लगती थी । सामान्यतः मैं यात्रा करते समय नामजप या सुविधा हो तो ध्यान करती हूं; किन्तु उस मार्गपर मुझे अत्यधिक नींद आती थी, चाहे मैं कितनी भी सतर्क रहूं ! आधे मार्गतक जाते-जाते निद्रामें झूलने लगती थी, ऐसे लगता था कि जैसे मेरा मुझपर कोई नियन्त्रण ही नहीं है । मैं समझ गई कि यह मार्ग भूतावेषित है । मैंने इसके विषयमें मेरे साथ जानेवाले किसी भी साधकको कुछ नहीं बताया और मैं मात्र निरीक्षण करती रही और पाया कि उस मार्गमें भयङ्कर दुर्घटनाएं नित्य होती थीं ।
      दो-तीन माहके पश्चात मेरी निद्रा उस मार्गपर अल्प हुई तो जो भी साधक वाहन चलाते थे, उन्हें भी अनियन्त्रित नींद आने लगती थी । एक दिवस तो मैं पीछेकी आसन्दीपर (सीटपर) ध्यानमें थी कि अकस्मात मुझे लगा कि जो साधक वाहन चला रहे हैं, उन्हें बहुत नींद आ रही है । मैंने जैसे ही उन्हें टोका तो वे हडबडाकर अपनी निद्रासे उठ गए  ! मैं समझ गई कि अनिष्ट शक्तियां मेरे वाहनको भी दुर्घटनाग्रस्त करवाना चाहती हैं । उस दिवसके पश्चात मैं प्रत्येक बार आगेकी ‘सीट’पर बैठती थी; किन्तु चाहे किसी भी समय आएं या जाएं और कोई भी साधक वाहन चलाए, उन्हें उस राजमार्गपर निद्रा आती ही थी । मैं सतर्क होकर वाहन चालकके या साधकके नेत्र कई बार देखती थी और मुझे ज्ञात होता था कि उनकी पलकें निद्रासे भारित हो जाती थीं और वह झपकी लेने लगता था या लगती थी ! यह एक वर्ष सतत प्रत्येक बार हुआ एवं धीरे-धीरे उसकी तीव्रता न्यून हो गई । एक बार तो हमारे एक साधक अकेले ही आश्रम आ रहे थे और वे उस राजमार्गको छोडकर, पुराने आगरा-मुम्बई राजमार्गसे आ रहे थे तो उनका वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उनके हाथकी अस्थि भी भंग हो गई और उनके नूतन वाहनकी स्थिति तो इतनी दयनीय हो गई  कि वे साधक भी उसे देखकर दुखी हो गए । कुछ दिवस पूर्व मैंने उन्हें कहा भी था कि अपने वाहनकी नित्य कुदृष्टि उतारा करें; किन्तु वे बहुत अच्छे चालक हैं तो उन्होंने मेरी बातको गम्भीरतासे नहीं लिया । जब मैं वाहनसे कहीं भी जाती हूं तो नामजप, प्रार्थना और सूक्ष्मसे कवच अवश्य लेती हूं; अन्यथा हमारे वाहनकी भी निश्चित ही दुर्घटना हो गई होती ! मैं वाहनमें कभी चित्रपटके गीत इत्यादि भी नहीं चलाने देती हूं । वह हमारा ‘धर्मरथ’ है, इस भावसे उसकी देखभाल करती हूं; इसीलिए हमारा रक्षण हुआ; किन्तु एक अच्छी बात यह हुई कि नित्य नामजप करते हुए उस राजमार्गसे आते-जाते रहनेसे उस मार्गकी अनेक अनिष्ट शक्तियोंको गति मिल गई और इस कारण उस राजमार्गपर दुर्घटनाएं भी न्यून हो गई हैं; किन्तु यह सब तात्कालिक होता है; क्योंकि अब पुनः हमारा नियमित जाना नहीं होगा तो वहां जो अनिष्ट शक्तियां हैं, वे पुनः अन्य अनिष्ट शक्तियोंको एकत्रित कर लेंगी; इसलिए आपने देखा होगा कि अनेक स्थानोंपर लिखा होता है, ‘दुर्घटना सम्भावित (आशंकित) क्षेत्र, कृपया धीरे चलें !’ मैंने सोचा आप सबको भी कुछ सीखने हेतु मिलेगा; इसलिए इस अनुभवको साझा किया है !


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