शिवराज शासनका प्रशंसनीय निर्णय, अंग्रेजीकी अनिवार्यता समाप्त, हिन्दीमें पढकर भी बन सकते है चिकित्सक


सितम्बर १३, २०१८

मध्यप्रदेशमें चिकित्सा पाठ्यक्रमोंकी परीक्षाओंके समय ४० सहस्त्र विद्यार्थियोंके लिए भाषा अब कोई बाधा नहीं रह गई है ! प्रान्तमें हिन्दीमें परीक्षा देकर भी एमबीबीएस और अन्य पाठ्यक्रमोंकी प्रतिष्ठित उपाधि प्राप्त की जा सकती है ! यह बात ‘मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय’के इसी वर्ष से लागू निर्णयसे सम्भव हो सकी है ।

‘पीटीआई-भाषा’के अनुसार, निर्णयके पश्चात हिन्दी पट्टीके इस प्रमुख राज्यमें एमबीबीएसके अतिरिक्त परिचर्या (नर्सिंग), दन्तीय, यूनानी, योग, प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) और अन्य चिकित्सा संकायोंके पाठ्यक्रमोंकी परीक्षाएं हिन्दीमें दिए जानेका प्रावधान आरम्भ हुआ है । जबलपुर स्थित विश्वविद्यालयके कुलपति डॉ. रविशंकर शर्माने गुरुवारको बताया, “परीक्षाओंके समय हमारे लिए यह जांचना आवश्यक होता है कि किसी विद्यार्थीको सम्बन्धित विषयका ज्ञान है या नहीं । इसमें भाषाकी कोई बाधा नहीं होनी चाहिए । यही सोचकर हमने अपने सभी पाठ्यक्रमोंकी परीक्षाओंमें अंग्रेजीके विकल्पके रूपमें हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दीके प्रयोगको अनुमति देनेका निर्णय किया है ।”

उन्होंने बताया कि इस वर्ष राज्यके १० चिकित्सा महाविद्यालयोंके इतिहासमें ऐसा प्रथम बार हुआ, जब एमबीबीएस पाठ्यक्रमके विद्यार्थियोंको हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दीमें परीक्षा देनेकी स्वतन्त्रता मिली । इस बार एमबीबीएस प्रथम वर्ष पाठ्यक्रमके कुल १२२८ में से ३८० विद्यार्थियोंने हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दीमें परीक्षा दी है ।

शर्माने कहा, “इस परीक्षाका परिणाम एक माहमें घोषित होनेकी आशा है । हमें विश्वास है कि यह परिणाम गत वर्षोंकी तुलनामें अच्छा होगा, क्योंकि इस बार परीक्षार्थियोंको हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दीमें परीक्षा देनेका विकल्प भी मिला है ।” उन्होंने यह भी बताया कि ‘मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय’के सभी पाठ्यक्रमोंके ४० सहस्त्र विद्यार्थी केवल सैद्धान्तिक परीक्षा ही नहीं, बल्कि प्रायोगिक और मौखिक परीक्षामें (वाइवा) भी हिन्दी या अंग्रेजी मिश्रित हिन्दीका प्रयोग कर सकते हैं ।

चिकित्सा पाठ्यक्रमोंमें हिन्दीमें शिक्षाकी राह विद्यार्थियोंके लिए सरल भी नहीं है । विशेषतया एमबीबीएस पाठ्यक्रमके लिए हिन्दीकी स्तरीय पुस्तकोंका गम्भीर अभाव है । इन्दौरके शासकीय महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालयके सह-प्राध्यापक (एसोसिएट प्रोफेसर) डॉ. मनोहर भंडारीने इस बातकी पुष्टि की और कहा, “चिकित्सा पाठ्यक्रमोंके विद्यार्थियोंके लिए हिन्दीकी अच्छी पुस्तकें आवश्यक हैं ।”

वर्ष १९९२ में हिन्दीमें शोध प्रबन्ध (थीसिस) लिखकर एमडीकी (फिजियोलॉजी) उपाधि प्राप्त करने वाले विद्वानने कहा, “चिकित्सा पाठ्यक्रमोंके लिए हिन्दीकी कुछ पुस्तकें तो ऐसी हैं जिन्हें पढकर सिर पीट लेनेका मन करता है । तकनीकी शब्दोंके अंग्रेजी से हिन्दीमें अनुवादके समय इन पुस्तकोंमें अर्थका अनर्थ कर दिया गया है ।”

 

“हिन्दी भाषामें पाठ्यक्रम आरम्भ करनेका शिवराज शासनका यह निर्णय अभिनन्दन योग्य है । अन्य शासनकर्ताओंने भी इससे शिक्षा लेनी चाहिए” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : लाइव हिन्दुस्तान



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