यूरोप धर्मयात्रा २०१९


यूरोपमें वर्ष २०१३ में भिन्न स्थानोंपर प्रवचनके माध्यमसे जो धर्म और साधनाका बीजारोपण ईश्वरने मुझसे करवाया था उसका उत्तम प्रतिसाद कुछ साधकोंके घरपर देखनेको इस वर्ष इस धर्मयात्राके मध्य मिला । जर्मनीके फ्रेंकफर्ट नगरके  श्री प्रकाश चाननाका घर आश्रम समान चैतन्यमय हो गया और उनका आध्यात्मिक स्तर भी ६१ % हो गया अर्थात वे जीवन मुक्त हो गए हैं (उनका अब पुनर्जन्म नहीं है, यह तथ्य मुझे पहलेसे ज्ञात था) । उनके घर घुसते ही मुझे बहुत ही सात्त्विक स्पंदनोंका भान हुआ । मैंने उन्हें बताया कि यहां तो देवत्व निर्माण होने लगा है ! उनके घरकी सात्त्विकता २० % हो गई है ! जहां विदेशोंमें सौ प्रतिशत घर भुतहा होते हैं, वहां ऐसा परिवर्तनने मनको अत्यधिक आनंदित किया । इसमें निश्चित ही प्रकाश भैयाकी साधनामें सातत्य, उनके और उनकी पत्नीद्वारा धर्मपालन , वास्तु शुद्धिके प्रयत्न सम्मिलित हैं । उनकेद्वारा जो प्रयत्न हुए है वह मैं निश्चित ही आपसे भविष्यमें  साझा करुंगी जिससे देश और विदेशमें रहनेवाले उपासनाके साधक भी ऐसा प्रयत्न कर सकें ! सूक्ष्मसे आई इस सन्देशका अगले दिवस मुझे तब प्रतीति मिली जब मैं उनके पूजाघरमें गई । आपको सबको पता ही होगा वह एक ठंडा प्रदेश है किन्तु ऐसे स्थितिमें भी उनके पूजा घरमें तुलसीके पौधे बहुत ही हरे-भरे हैं और वह भी एक नहीं, पांच या छ: होंगे । उनके पूजा घरमें उनकेद्वारा नियमित पिछले कुछ वर्षोंसे किए गए नामजपके सूक्ष्म स्पंदनोंका भी मुझे स्पष्ट आभास हुआ । उनके पूजा घरसे निकलनेवाले चैतन्य सम्पूर्ण वास्तुमें पसर रहा था और उसके कारण सम्पूर्ण वास्तुमें देवत्व निर्माण होने लगा है ।      जब मैं ईश्वर आज्ञा अनुरूप वर्ष २०१३ में एक महिला जिज्ञासुके निमंत्रणपर इटली गई थी तो वहां जानेपर मुझे ईश्वरसे सन्देश आया कि उपासनाके कुछ और साधक कुछ और देशोंमें प्रतीक्षारत हैं, उनसे भी मिलना है मुझे । मैंने एक जिज्ञासु जो साधक प्रवृत्तिके थे उनसे अपनी यह ईश्वरीय सन्देश साझा की और उन्होंने अपने संपर्क सूत्रोंके माध्यमसे जर्मनी एवं कुछ यूरोपीय देशोंके कुछ नगरोंमें प्रवचन  कराया । ऐसे ही एक अफगानी हिन्दू मंदिरमें प्रवचनके मध्य, प्रकाश भैयासे मेरी भेंट हुई ! आश्चर्य वे मुझसे पहलेसे परिचित थे; क्योंकि वे यू-ट्यूबपर मेरे सत्संग सुनकर साधना आरम्भ कर चुके थे । वे अपने सम्पूर्ण परिवारके साथ मेरे प्रवचन सुनने आये थे । प्रवचनके पश्चात हमें त्वरित इटली निकलना था; किन्तु वहांके हिन्दुओंको इतना कष्ट था कि उनके ऊपर आध्यात्मिक उपचार होनेके कारण मुझे अत्यधिक थकावट हो गई । जब प्रकाश भैया प्रवचनके पश्चात सपत्नी मुझे कुछ अर्पण जो उन्होंने मुझसे मिलनेसे पूर्वसे ही एकत्रित किए थे वह देने लगे तो मैंने उनसे कहा कि एक दिवस उनके घर विश्राम कर ही अगले दिवस इटलीके लिए निकलूंगी ! उन दम्पतिके भावाश्रु आज भी मुझे स्मरण है ! वस्तुत: मैं उनके लिए ही वहां गई थी । जब मैंने उनके घर गई तो मुझे ज्ञात हुआ कि ये तो साधक है; क्योंकि इटलीके ऊपर जितने भी देश हैं वहां अधिकांशत: लोग शौचके पश्चात पानीके स्थानपर कागदका  (कागज) उपयोग करते हैं किन्तु भैयाके शौचालयमें एक डब्बा था । मैं समझ गई कि उन्होंने मेरे सत्संगोंको मात्र ध्यानसे सुना नहीं है अपितु उस आचरणमें भी लाया है ! मैंने उनसे पूछा, “आपके शौचालयमें मुझे जलका पात्र मिला, देखकर बहुत आनंद हुआ, यह किसने बताया आपको ?; क्योंकि यहां तो मंदिरोंमें भी शौचालयमें जल लेनेकी सुविधा नहीं है, ऐसा मैंने पाया है । “ वे संकोच कर कहने लगे “आपने ही एक सत्संगमें बोला था कि आजके हिन्दुओंको धर्म और अध्यात्म क्या सिखाया जाए, उन्हें मल-मूत्र त्यागनेपर पानी लेना सिखाना पडता है, आपसे सीखकर ही मैंने पानीका पात्र अपने प्रसाधन कक्षमें रखा है ।” उनका आध्यात्मिक स्तर उस समय ५० % था; किन्तु मन एवं बुद्धिपर बहुत आवरण था, मैंने उन्हें साधना एवं आध्यात्मिक उपचार बताये और प्रतिदिन ब्यौरा भेजने हेतु कहा और उन्होंने अपनी साधनामें सातत्य रखा  साथ ही वे नियमित स्वभाव दोष निर्मूलन भी करते रहे और आज भी कर रहे हैं । जैसे एक माताको अपने बच्चोंको बढते देख आनंद होता है, वैसे ही मुझे साधकोंको धर्म और साधना पथपर बढते देख आनंद होता है । इस बार मेरी विदेश यात्रा प्रकाश भैयाके कारण सार्थक हुआ । ईश्वर उनकी उत्तरोत्तर आध्यत्मिक यात्राको गति प्रदान करें, यह उनके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करती हूं ! इससे सूक्ष्मसे मिले सन्देशकी स्थूल पुष्टि भी हुई ! 



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