यूरोप धर्मयात्रा २०१९


इटलीमें हमारे एक साधकको कुछ लोग धार्मिक (आध्यात्मिक) समझकर उन्हें भारतसे अनेक देवी-देवताओंकी मूर्ति या चित्र भेंटके रूपमें देते थे ! जब मैं उनके घर पहुंची तो मुझे उनके घरके स्पन्दनमें बहुत अधिक अंतर ध्यानमें आया | मैं बहुत आश्चर्यचकित थी कि ऐसा कैसे हो गया | किन्तु जैसे ही उनके पूजा घरमें गई तो मुझे उनके घरके स्पंदनोंमें अंतरका एक कारण ध्यानमें आ गया ! मैंने उनसे कहा, “आपने इतने सत्संग सुननेके पश्चात भी अपने पूजा घरमें इतने सारे देवी-देवताओंके चित्र और मूर्तियां क्यों रख दीं ? मैं लोगोंको कहती हूं कि अपने पूजा घरको अजायब घर (meuseu) न बनाएं आपने इतने सत्संग सुननेके पश्चात भी ऐसी चूक कैसे की ?” तो उन्होंने कहा , “मैंने सोचा उन्हें बुरा लगेगा और वे लोग मेरे घरमें भी आते रहते हैं; इसलिए मैंने उनके दिए चित्रको अपने पूजा घरमें लगा दिया |”     साधको, दूसरोंको बुरा लगेगा इसलिए अपना अहित न करें | लोगोंके अयोग्य कृतियोंका प्रेमसे न में उतर देना सीखें, उन्हें योग्य दृष्टिकोण देना सीखें ! इस साधकने एक बार पहले भी अपने एक सह साधकको अपने सामने ऐसा भोजन खाने दिया जो उन्हें वर्जित था | जब मैंने उनसे पूछा कि आपने उन्हें रोका क्यों नहीं तो पुनः उनका यही उत्तर था कि उसे बुरा लगता इसलिए मैंने मना नहीं किया ! ध्यान रखें, भावनाप्रधानता अध्यात्मके पथिकके लिए एक बहुत बडा दोष होता है इससे वह स्वयं भी अटक सकता है या अपना हानि कर सकता है और दूसरोंका भी ! इसलिए योग्य समयपर एवं योग्य प्रकारसे किसीके भी अयोग्य आचरणका प्रतिकार करना सीखें ! 



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