नवम्बर १३, २०१८
भारतमें खुलने वाली लगभग ८०० अश्लील जालस्थलोंको सरकारने बंद कर दिया है; लेकिन सरकारकी इस कार्यवाहीपर तकनीकी दिग्गज भडक गए हैं ! सरकारने लगभग तीन वर्ष पूर्व भी ऐसा ही आदेश जारी किया था, जिसे बादमें वापस ले लिया गया । विशेषज्ञोंका इस बारेमें कहना है कि सरकारके इस निर्णयमें वैधानिक स्वीकृति नहीं है; क्योंकि देशमें ऐसा कोई विधान नहीं है, जो अश्लीलताको प्रतिबंधित करता हो । उनका कहना है कि बच्चोंको लेकर बने वीडियो और ऐसी ही अन्य सामग्री परोसने वाले जालस्थलोंपर कडी कार्यवाही और प्रवर्तनकी आवश्यकता है । विशेषज्ञोंका कहना है कि अश्लील जालस्थलोंपर प्रतिबन्ध लगानेका कोई आधार नहीं है । सरकारने २२ अक्टूबरको ८२७ जालस्थल प्रतिबन्धित कर दिए थे ।
‘टीओआई’के समाचारके अनुसार, साइबर लॉके विशेषज्ञ पवन दुग्गलने कहा, भारतके किसी विधानमें पॉर्न देखना अपराध नहीं माना गया है । उन्होंने कहा, चाइल्ड पॉर्नोग्राफीको नियन्त्रण करनेके लिए पूर्ण रूपसे समाधान निकालना होगा । प्रतिबन्ध लगाना व्यवहारिक हल नहीं है । उन्होंने कहा, पूर्ण रूपसे इन जालस्थलपर पूर्ण रूपसे प्रतिबन्ध लगाना समाधान नहीं है ।
बता दें कि, उत्तराखंड हाई कोर्टके आदेशके पश्चात् सरकारने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्सको अश्लील सामग्री प्रसारित करने वाली ८२७ जालस्थलोंको बन्द करनेके लिए निर्देश दिया था । ‘रिलायंस जिओ’ने इस आदेशका पालन करते हुए इसपर निर्णय लिया था ।
“विरोध करने वाले तथाकथित बुद्धिवादियोंके पास कोई अन्य समाधान है क्या ? पूर्ण रूपसे नियन्त्रण लगना चाहिए, परन्तु प्रतिबन्ध करना अनुचित है, यह कौनसा उपाय है ! जब देश और उसका भविष्य नीचे जा रहे हो तो विधान भी बदले जा सकते है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जनसत्ता
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