दुष्कर्मके आरोपी व ‘एससी-एसटी एक्ट’में कारावासमें रहे ब्राह्मणको २० वर्षोंके पश्चात न्यायालयने पाया निर्दोष


२४ फरवरी, २०२१
    इलाहाबाद उच्च न्यायालयने एक व्यक्तिको बीस वर्षोंके पश्चात निर्दोष बताया है । उसे किसी गर्भवती महिलाद्वारा दुष्कर्मका आरोप लगानेपर बन्दी बनाया गया था । बीस वर्षोंके पश्चात उसपर कोई आरोप सिद्ध नहीं हो सका, तो उच्च न्यायालयने शासनके इस व्यवहारपर कठोर टिप्पणी की ।
पांच माहकी गर्भवती महिलाने विष्णुपर दुष्कर्मका आरोप लगाया था । बन्दी बनाए जानेके तीन दिवस पश्चात उसपर प्राथमिकी प्रविष्ट की गई थी । उसपर आरोप लगाया गया था कि यदि महिलाने किसीको बताया तो विष्णुने उसे मार डालनेकी धमकी दी थी । महिलाके ससुरने बताया था कि पंचायत बुलाई गई थी; किन्तु पंचायतमें कौन-कौन बुलाया गया था ? इसका कोई उल्लेख नहीं मिला । दुष्कर्मके कारण किसी प्रकारकी चोटका भी कोई चिह्न नहीं पाया गया था । न्यायालयके अनुसार, १४ वर्षोंके पश्चात बन्दीके आरोपोंपर विचार किया जाना चाहिए, जो कि नहीं किया गया । विष्णुके निवेदनपर, बीस वर्षोंके पश्चात उसपर यह निर्णय दिया गया कि वह निर्दोष सिद्ध हुआ है ।
   वास्तवमें विवादका मूल कारण उन दोनोंके मध्य भूमिको लेकर हुआ था ।
      यह है हमारा न्यायतन्त्र व विधान ! एक घटिया अधिनियमके चलते एक निर्दोषको वर्षों कारावासमें सडना पडा ! कांग्रेसके इन निकृष्ट विधानोंसे त्रस्त भारतीयोंको भाजपा शासनसे आशा थी कि वे ऐसे अधिनियमोंको निरस्त करेंगे; परन्तु उन्होंने भी इसका समर्थन ही किया । क्या इस व्यक्तिके जीवनका मोल कोई भी नेता या उनके पुत्रके रूपमें चुकाया जा सकता है ? सम्भवतः नहीं । ऐसे शासकगण व ऐसे राजनीतिक दल राजनीतिके योग्य नहीं हो सकते हैं, जो इस देशको विधान भी नहीं दे पाए ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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