मुसलमानोंमें जन्म लेने वाले, चारों वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर हयात उल्‍ला हो गए ‘चतुर्वेदी’ !


सितम्बर १४, २०१८

उत्तरप्रदेशकी अवधी संस्कृति और गंगा-जमुनी परम्परा पूरे विश्वमें अपनी सहिष्णुताके लिए प्रसिद्ध है । इसी अवधी संस्कृतिके ध्वजवाहक हैं, पण्डित हयात उल्ला चतुर्वेदी ! ७५ वर्षके हयात उल्ला चतुर्वेदी पांच समयके नमाजी भी हैं और चारों वेदोंके जानकार भी; लेकिन उनके नामकी कहानी उनसे भी अधिक रोचक है । हयात उल्ला बचपन से ही हिन्दी और संस्कृतके बडे प्रेमी हैं । युवा होनेपर वह इलाहाबादके एमआर शेरवानी इण्टर महाविद्यालयमें हिन्दी और संस्कृतके अध्यापक हो गए । २००३ में जब वह विद्यालयसे निवृत्त हो गए, तब ये मेहगांव इण्टर महाविद्यालयमें नि:शुल्क हिन्दी और संस्कृत पढा रहे हैं । वर्ष १९६७ में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलनमें संस्कृतके देश भरके विद्वान इलाहाबादमें एकत्र हुए थे । वहीं हयात उल्लाके संस्कृत ज्ञान और वेदोंके प्रति प्रेम से प्रभावित होकर, उन्हें उस सम्मेलनमें ‘चतुर्वेदी’की उपाधि दी गई थी ।


हिन्दी और संस्कृतके विद्वान हयात उल्ला चतुर्वेदी अंग्रेजी और उर्दूके अतिरिक्त अरबी भाषाका भी ज्ञान रखते हैं; लेकिन हयात उल्लाको इस बातका भी दुःख है कि संस्कृतको उसके अपने देशमें ही दुर्बल किया जा रहा है । उनका मानना है कि संस्कृत एकमात्र भाषा है, जो धर्मकी रेखा लांघकर नए हिन्दुस्तानको बना सकती है । उनका कहना है कि संस्कृतको अंग्रेजोंने सबसे पहले दुर्बल किया था ताकि अंग्रेजीको देशमें बढावा दिया जा सके । इस षडयन्त्रको देशके नेता समझ नहीं पाए और आज तक अंग्रेजोंके पदचिह्नोंपर चल रहे हैं ! संस्कृतके प्रचार व प्रसारके लिए वह अमेरिका, नेपाल, मॉरीशस आदि देशोंमें  संगोष्ठी (सेमिनार) भी कर चुके हैं ।

पण्डित हयात उल्ला चतुर्वेदीको ‘जेहाद’ शब्दकी  व्याख्याका भी दुःख है । उनका मानना है कि जेहादका अर्थ धर्म युद्ध है । महाभारत भी धर्मकी रक्षाके लिए हुआ था । धर्म रक्षाका अर्थ मानवताकी रक्षा से है, न कि किसी धर्म विशेषकी रक्षा से । हयात उल्लाह चतुर्वेदी शाकाहारी हैं । वह शाकाहारको ही अपने स्वास्थयका राज भी बताते हैं । हयात उल्लाहने संस्कृत भाषाके प्रचार-प्रसारके लिए संस्कृतकी कई पुस्तकें लिखी हैं । इन पुस्तकोंमें संस्कृत परिचायिका प्रमुख है । उनके शिक्षित किए हुए कई शिष्‍य भी आज संस्‍कृत शिक्षक हैं ।

 

“इतनी विकट स्थितिमें जहां दूसरे धर्मका नाम लेनेपर भी हत्या हो जाती है, संस्कृत देवभाषाकी रक्षा करने वाले इस मुस्लिम विद्वानको हम नमन करते हैं” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : जनसत्ता



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