१० दिसम्बर, २०२०
देहलीमें चल रहे कथित किसान आन्दोलनमें भारतीय किसान सङ्गठनने १० दिसम्बर २०२० को मानवाधिकार दिवसपर माओवादी-नक्सलियोंके संग सम्बन्ध होनेके आरोपमें अवैधानिक गतिविधियां संशोधन विधेयकके (यूएपीए) अन्तर्गत बन्दी बनाए गए अनेक आरोपियोंको मुक्त करनेकी मांग की है ।
‘इंडियन एक्सप्रेस’के समाचार अनुसार, जिन्हें मुक्त करनेकी याचना की गई है, उनमें असमको भारतसे काटनेकी बात करनेवाले शरजील इमाम, उमर खालिद, गौतम नवलखा, पी वरवरा राव, वर्नन गोंजाल्वेस, अरुण फरेरा और कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज सहित २० से अधिक आरोपियोंके छायाचित्र टिकरी सीमाके निकट एक मंचपर लगाए गए । अनेक मानवाधिकार समूहोंके इसमें भाग लेनेकी आशा है ।
‘बीकेयू’के (उगराह) अधिवक्ता और समन्वयक एन.के. जीतने कहा कि प्रथम दिवससे ही उनकी याचना रही है कि बन्दीगृहमें बन्दी बनाए गए मानवाधिकार कार्यकर्ताओंको मुक्त किया जाए । उन्होंने कहा कि नगरीय नक्सलियों, कांग्रेस तथा खालिस्तानियोंद्वारा कृषि आन्दोलनको उग्र किया गया है । उन्होंने कहा कि पंजाबके लोगोंको ‘स्टेट टेररिज्म’ और आतङ्कवादियोंके मध्य फंसाया जाता है, जबकि नक्सलवादियोंने आदिवासी लोगोंको उनके अधिकार प्राप्त करवानेमें सहायता की है ।
उल्लेखनीय है कि अपनी याचनाओंपर अडिग रहकर केन्द्रद्वारा प्रस्तुत २० पृष्ठोंके प्रस्तावको किसान सङ्गठनोंने बुधवारको नकार दिया था । किसानोंने देहलीकी और जानेवाले मार्गोंको अवरुद्ध करके अपने आन्दोलनको और उग्र करनेकी धमकी दी है । उन्होंने कहा कि १४ दिसम्बरको भाजपा नेताओंके आवासोंको घेरा जाएगा तथा देशभरके मुख्यालयोंपर धरने होंगे । इसके साथ ही दक्षिणी राज्योंमें विरोध अनिश्चित कालतक चलता रहेगा ।
किसान आन्दोलनके नामपर नक्सली, खालिस्तानी,कुछ राजनीतिक दल तथा कुछ देशद्रोही लोग केन्द्र शासनपर आकमण करते दृष्टिगत हो रहे हैं । देहलीमें हुए उपद्रवके अन्तर्गत अनेक आरोपियोंको ‘यूएपीए’के अन्तर्गत बन्दी बनाया गया था । किसान आन्दोलनमें ऐसे आरोपियोंको मुक्त करनेके सन्देश देना ही सिद्ध करता है कि आन्दोलन किसान नहीं, वरन उनके नामपर देशद्रोही, वामपन्थी और विपक्षी कर रहे हैं । ऐसे आन्दोलनकारियोंपर कठोर कार्यवाही होनी चाहिए । कारण ये किसान नहीं; वरन देशद्रोही हैं । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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