बडबोले फारूक अब्दुल्लाने कहा, स्थानीय आतंकी अपने बच्चे, उनका दुःख जानना चाहिए !!


जनवरी २०, २०१९

पूर्व मुख्यमन्त्री और नेकां अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्लाने भी महबूबा मुफ्तीकी भांति स्थानीय आतंकियोंसे वार्ता करनेकी बात की है । कहा कि वे अपने बच्चे हैं । यह जानना चाहिए कि उन्हें दुख क्या है ? क्यों उन्होंने बंदूक उठाई ? पाकिस्तानी आतंकियोंसे कोई लेना-देना नहीं है । तालिबानसे वार्ता हो सकती है तो हुर्रियत शसे क्यों नहीं ?

पृथकतावादियोंसे भी वार्ता होनी चाहिए । कुछ निहित स्वार्थी तत्व नहीं चाहते कि घाटीमें शान्ति आए । ऐसे तत्व ही बातचीतमें बाधा बनते हैं । यह आवश्यक नहीं है कि उनकी बातोंपर कार्य हो ही; परन्तु बात तो सुननी चाहिए ताकि उन्हें यह लग सके कि उनकी बात सुननेवाला भी कोई है ।

उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थी तत्वोंके कारण घाटीमें शान्ति आनेमें परेशानी आ रही हैं । यह निहित स्वार्थी तत्व केन्द्र शासन, पाकिस्तान तथा स्वयं जनता है । ऐसे तत्वोंका अभिज्ञानकर उनको समाप्त करना होगा । उन्होंने कहा कि कश्मीरकी स्थिति अच्छी नहीं हैं । आतंकवाद भीतरसे राज्यको खा रहा है । इससे लडना है तो लोगोंका हृदय जीतना होगा । वार्ताके लिए वातावरण तैयार करना होगा ।

पाकिस्तानके प्रधानमन्त्री इमरान खानसे भी विनती है कि वह अपने यहां आतंकवादको समाप्त करें । साथ ही आतंकवादको बढावा देना बंद करें । उन्होंने कहा कि शांतिके लिए आवश्यक है कि भारत व पाकिस्तानके मध्य मित्रता हो । पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयीजी भी कहा करते थे कि दोस्त बदले जा सकते हैं, परन्तु पडोसी नहीं; इसलिए पड़ोसियों के बीच दोस्ताना संबंध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय स्वायत्तता कोई नया नहीं है । इससे जम्मू, कश्मीर व लद्दाख तीनों क्षेत्रोंका विकास होगा । यदि नेकांका राज्यमें शासन बनी तो ३० दिवसोंके भीतर स्वायत्तता का प्रस्ताव पारित होगा।

 

“यदि आसुरी वृत्तिकको प्रेमसे ही परास्त किया जाता तो स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्णको शस्त्र उठानेकी क्या आवश्यकता थी ? आतंकियोंमें बालपनसे ही इस्लामिक आतंकका बीज बोया जाता है, जिसका परिणाम राष्ट्रद्रोहके रूपमें सामने आता है ! तो ऐसे आतंकीको तबतक नहीं सुधारा जा सकता, जबतक या तो उसे प्रताडना न दी जाए, या उसके स्वयंके परिवारके लोग उसपर बल न डालें । भारतीय सेना अभीतक प्रेम ही तो दिखाती आई है, अन्यथा कौनसा राष्ट्र अपने सैनिकोंको मौन रहकर पत्थर खानेके लिए छोडता है ? और यदा-कदा प्रयोग करना भी पडे तो ‘एके-४७’के समक्ष ‘पैलेट गन’का ही प्रयोग होता है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : जागरण



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