पाश्चात्यवादका अन्धा अनुकरण कर गर्भावस्थासे शिशुको अनिष्ट शक्तिसे आवेशित करनेकी पूर्वसिद्धता करनेवाली आजकी निर्लज्ज कुमाताएं !


एक सुप्रसिद्ध सुभाषित है ‘माता कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।’ अर्थात् पुत्र कुपुत्र हो सकता है किन्तु माता कभी कुमाता नहीं होती; परन्तु आजकी कुछ निर्लज्ज स्वेराचारी स्त्रियोंने इस शास्त्रवचनको झुठलाना आरम्भ कर दिया है । पाश्चात्योंका अनुकरण कर आजकल, भारतकी कुछ चलचित्र एवं मॉडलिंग जगतकी स्त्रियां अपने गर्भावस्थाकी अर्ध नग्न छायाचित्र सामाजिक जालस्थानपर साझा करती हैं एवं पत्रकारिताके सर्व आदर्शोंका त्याग कर, इन्हें भिन्न समाचारपत्र और पत्रिकाएं भी निर्लज्जतासे साझा करती हैं !    वस्तुत: गर्भवती स्त्रीने अपने गर्भस्थ उदरका इसप्रकारसे उच्छृंखल होकर सार्वजानिक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह उनके कुसंस्कारी होनेका प्रमाण तो देती ही हैं साथ ही इससे गर्भमें पल रहे शिशु अनिष्ट शक्तियोंके कष्टसे आवेशित हो जाता है । ऐसे शिशुओंमें भिन्न प्रकारके मानसिक विकार एवं असाध्य रोग अल्पायुसे होने लगते हैं; किन्तु स्त्री-स्वतन्त्रताके नामपर आजकी कुछ स्वेराचारी स्त्रियां पाश्चात्य संस्कृतिकी विकृत मानसिकताका अन्धा अनुकरण करनेमें गर्व अनुभव करती हैं और अपनी सभी स्त्री सुलभ मर्यादाओंको लांघकर अपने गर्भवती होनेका सार्वजनिक रूपसे निर्लज्जतासे अर्ध नग्न होकर प्रदर्शन करती हैं । स्वेराचार करनेवाली ये स्त्रियां अपने मातृत्वका भी ओछी प्रसिद्धि पाने हेतु उपयोग करती हैं, ऐसी स्त्रियां माता नहीं, कुमाता कहलानेकी पात्र होती हैं  ! इससे ही धर्मविरहित समाजका किस सीमातक मानसिक और बौद्धिक पतन हो जाता है यह ज्ञात होता है । हमारी संस्कृतिमें अपने शिशुका गर्भकालसे सर्वांगीण विकास हो एवं अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण हो इस हेतु सोलह संस्कार अन्तर्गत अनेक संस्कार कर्म गर्भाधान रूपी संस्कार कर्मसे आरम्भ हो जाते थे और आज अपने ही शिशुके सर्वनाश हेतु माताएं अपनी वैदिक संस्कृतिको त्यागकर मलेच्छोंकी संस्कृतिको अपनाकर अपनी मूर्खताका परिचय देती हैं । अब ऐसा माताओंसे समाजकंटक जन्म नहीं लेंगे तो क्या समाज उद्धारक जन्म लेंगें ?



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