गीता सार: भाव और भावनाका अंतर


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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ – श्रीमदभगवादगीता(२.३१)
अर्थ : अपने धर्मको देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रियके लिए धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है|

भावार्थ : अध्यात्ममें भावनाके लिए कोई स्थान नहीं होता | यहां मोहग्रस्त अर्जुनसे भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि उन्होंने वर्णानुसार अपना धर्म पालन करना चाहिए | और क्षत्रियका धर्म है युद्ध करना चाहे प्रतिद्वंदी पक्ष अपने स्वजन ही क्यों न हो | क्योंकि धर्मपालनसे बडा कोई कर्तव्य साधकके लिए नहीं होता | जो भी साधक षडरिपुमें (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर ) फंस कर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता वह एक प्रकारसे अधर्म करता हैं | अध्यात्ममें भाव और भावनाका अंतर साधकको समझना चाहिए तभी वह अडिग होकर धर्म पथपर अग्रसर हो सकता है | भावना अर्थात जो हमारा मन कहता है और भाव अर्थात जो ईश्वरको चाहिए, जो धर्म कहता है | यहां अर्जुन अपने सगे – संबंधी, गुरुजन एवं मित्रोंको युद्धक्षेत्रमें प्रतिद्वंदी पक्षमें देखकर मोहग्रसित हो जाते हैं और भावना उन्हें घेर लेती है | अतः ईश्वरको(भगवान कृष्ण) उन्हें उनका वर्णानुसार धर्म बताना पड़ता है और वे भावना छोड उन्हें युद्ध करनेके लिए उद्युक्त करते हैं | भावना और भावमें अंतरको आत्मसात करनेके लिए साधकने प्रत्येक प्रसंगमें यह देखना चाहिए कि क्या ईश्वरको मेरी इस कृतिसे ईश्वर प्रसन्न होंगे और क्या यह कृति धर्म अनुसार योग्य है | इस प्रकारसे अखंड अभ्यास करनेपर साधक किसी भी परिस्थितिमें भावनामें नहीं बहता और विवेकका आधार ले धर्म पालन करता है |-

-तनुजा ठाकुर



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