गीता सीखने हेतु योग्य आध्यात्मिक स्तरकी आवश्यकता है !


कुछ साधक ‘वैदिक उपासना पीठ’के आश्रममें आनेके पश्चात हमें भगवद्गगीता सिखानेका आग्रह करते हैं । गीता सीखने हेतु कुछ आवश्यक गुण होने चाहिए, जिसमें प्रथम गुण है, हमारी वृत्तिका मूलतः सात्त्विक होना एवं बुद्धिका तीक्ष्ण होते हुए विवेकका जागृत होना । वह भगवानके श्रीमुखसे निकला हुआ वेदवचन है । यदि हमारी वृत्ति तमोगुणी हो तो हम उसका कितना भी पाठ कर लें, उसका सार हमें ग्रहण नहीं होनेवाला है । अत्यन्त विनम्रतासे यह सूचित करना चाहूंगी कि आज गीताका अभ्यास करानेवाली अनेक आध्यात्मिक संस्थाएं सम्पूर्ण विश्वमें कार्यरत हैं; किन्तु गीताकी मुख्य सीख क्षात्रधर्म साधना है, जो ये संस्थाएं धर्मकी ग्लानिकी पराकष्ठापर पहुंचनेपर भी लोगोंको नहीं सिखाती हैं और न ही स्वयं आचरणमें लाती हैं ! किसी धर्मग्रन्थको रटनेसे क्या लाभ ?, जब आप उसकी सीखको न स्वयं चरितार्थ करते हैं और न ही दूसरोंको चरितार्थ करवाते हैं । भगवद्गीताका अभ्यास अपनी वाक्पटुता एवं ज्ञानके प्रदर्शन हेतु न करें, उसकी सीखको आत्मसात करने हेतु करें; किन्तु गीता आत्मसात कर लोगोंको उसकी सीखको समझाने एवं समझने हेतु हमारा आध्यात्मिक स्तर न्यूनतम ६० प्रतिशत होना चाहिए; इसीलिए भगवान श्रीकृष्णने गीताका ज्ञान पाण्डवोंमें भी मात्र अर्जुनको ही दिया था । शास्त्र अनुसार ‘सत्पात्रे दानं’ होना चाहिए; अतः आगामी हिन्दू राष्ट्रमें गीताका पाठ आध्यात्मिक स्तर अनुरूप दिया जाएगा ।  – तनुजा ठाकुर



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