गीता सार – ज्ञानयोग


गीता सार  :

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥  – श्रीमदभगवद्गीता (४: ३६)

अर्थ : यदि तू अन्य सब पापियोंसे भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाद्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्रसे भलीभांति तर जाएगा |

भावार्थ : साधनाके माध्यमसे हम अपने सारे कर्मोंके कर्मफलको भस्म कर सकते हैं | साधनाके अनेक मार्ग हैं – कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग इत्यादि | यहांपर भगवान श्रीकृष्ण खरे ज्ञानका महत्त्व बता रहे हैं | एक खरा ज्ञानमार्गी अपने ज्ञानरूपी तेजसे अपने पूर्व संचितके सभी कर्मोंके फलको भस्म कर देता है | ज्ञानमार्गी किसी भी कर्मके कर्तापनका लेश मात्रका भार जब स्वयंपर नहीं लेता और सारे कर्म निष्काम भावसे ईश्वरेच्छा मान  करता है तो उसे आत्मबोध हो जाता है | वह बडीसे बडी विपत्तिमें अपने धैर्यको डिगने नहीं देता और समद्रष्टा समान वर्तन करता है अर्थात् न वह दु:खसे दु:खी होता है और न ही सुखसे सुखी होता है, वह सुख और दु:खकी संकल्पना मात्रको स्वीकार नहीं करता  | उसे सर्वत्र ब्रह्म ही दिखाई देता है | स्वत: में और इस सम्पूर्ण सृष्टिमें भेद समाप्त हो जाता है और ऐसी स्थितिमें उसके सर्व संचितके पाप ज्ञानाग्निमें भस्म हो जाते हैं | परंतु ज्ञान मार्ग अनुसार साधना करना सरल नहीं है, अनेक व्यक्तियोंको शास्त्रोंका तो सम्पूर्ण ज्ञान होता है परंतु जब उन्हें शास्त्रको यथार्थमें उतारना होता है तो वे उसमें असमर्थ हो जाते हैं ! ज्ञानमार्गकी साधनाके लिए अति तीक्ष्ण बुद्धि, सात्त्विक प्रवृत्ति, अपने इंद्रियोंपर पूर्ण नियंत्रणके साथ ही सारी परिस्थियोंका तटस्थ होकर विश्लेषण कर योग्य वर्तन करना जैसे गुण आवश्यक हैं |

-तनुजा ठाकुर

 

 



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