गीता सार-सकाम कर्म एवं निष्काम कर्म


युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌ ।

अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥  – श्री मद्भगवद्गीता (५:१२)

अर्थ : कर्मयोगी कर्मोंके फलका त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूपी शान्तिको प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामनाकी प्रेरणासे फलमें आसक्त होकर बंधता है ॥

भावार्थ : कर्म दो प्रकारके होते हैं सकाम कर्म एवं निष्काम कर्म | सकाम कर्म अर्थात् फलकी इच्छाको प्राप्त करने हेतु किया गया कर्म और निष्काम कर्मका अर्थ है बिना फलकी इच्छाके कर्म करना | कर्मयोग अनुसार कर्म करनेपर कर्म  अकर्म कर्ममें परिवर्तित हो जाता है अर्थात् उस कर्मका कर्मफल नहीं बनता | कर्मका अकर्म होने हेतु, निष्काम कर्म और अकर्तापनयुक्त कर्म करना आवश्यक है | निष्काम कर्म करनेसे फल अच्छा मिले या बुरा, कर्मयोगी न अच्छा फल मिलनेसे सुखी होता है और न ही बुरा फल मिलनेसे दु:खी होता है अतः वह सुख और दुखसे परेकी स्थिति जिसे आनंद कहते हैं उसकी अनुभूति ले सकता है और यह तभी संभव है जब कोई निस्पृह रहे | कर्म करते समय यदि कर्मके फलकी इच्छा होती है तो उससे सुख या दु:ख प्राप्त होता है और व्यक्ति कर्मफलके बंधनमें बद्ध हो जाता है |-

-तनुजा ठाकुर



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