गीता सार-योगमें श्रद्धा रखनेवाला


अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ – श्रीमद्भग्वद्गीता (६:३७)
अर्थ : अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण ! जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित हो गया है, ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है ?
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ – श्रीमद्भग्वद्गीता (६:३८)
अर्थ : हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्तिके मार्गमें मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादलोंकी भांति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता ?
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ – श्रीमद्भग्वद्गीता (६:३९)
अर्थ : हे श्रीकृष्ण ! मेरे इस संशयको सम्पूर्ण रूपसे छेदन करनेके लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना संभव नहीं है |
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ – श्रीमद्भग्वद्गीता (६:४०)
अर्थ : श्री भगवान बोले- हे पार्थ ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही क्योंकि हे पार्थ ! आत्मोद्धारके लिए अर्थात भगवत्प्राप्तिके लिए कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता |
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ – श्रीमद्भग्वद्गीता (६:४१)
अर्थ : योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर उनमें अत्यधिक वर्षों तक निवास करके पुनः शुद्ध आचरणवाले श्रीमान पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है |

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