अक्तूबर १, २०१८
चमोलीप्रान्तकी पहाडियोंमें घूमने आए जर्मनीके ११ सदस्यीय दलको यहांके रीति-रिवाज, भाषा और हस्तशिल्प भा गया । परर्यटकोंने ग्रामीणोंसे रिंगालकी टोकरियां भी क्रय की और बच्चोंको सामान वितरण किया । छह दिवसोंतक पर्यटक स्थलोंके भ्रमणके पश्चात पर्यटक पुनः आनेका वचन देकर वापस चले गए ।
२४ सितम्बरको जर्मनीसे ११ पर्यटकोंका दल गोपेश्वरके समीप रौली-ग्वाड गांवमें स्थित ‘होम स्टे’में ठहरनेके लिए आया था ।
दलके सदस्योंने पर्यटन स्थल चोपता, मम्डल घाटी और कुजौं-मैकोटके भ्रमणपर पहुंचा । संस्थाने पर्यटकोंको डुंगरी और कुजौं-मैकोट गांवमें हस्पशिल्प कला दिखाई ।
पर्यटकोंको हस्तशिल्प कला इतनी भा गई कि उन्होंने पन्द्रह टोकरियां भी क्रय की । प्राथमिक विद्यालय कुजौं-मैकोटमें उन्होंने ३७ बच्चोंको स्कूल बैग, कॉपियां, पेंसिल व अन्य सामग्री भी वितरित की ।
साथ ही डुंगरी गांवमें एक निर्धन विधवा महिलाको सात सहस्त्र रुपयेकी आर्थिक सहायता दी ।
“ऐसी है हमारी ‘अतिथि देवो: भव:’की वैदिक सनातनी परम्परा व संस्कृति जिसमें अतिथिको देव माना जाता है और शेष यहांके सात्विक वातावरणमें एवं हस्तकलामें है, जो लोग यहांके हो जाते हैं । ऐसे हमारी जन्मदात्री भारत भूमिको नमन !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : अमर उजाला
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