घरका वैद्य : आक (अर्क) (भाग-४)


* कर्णशूल हेतु :

– आकके भली प्रकार पीले पड रहे पत्तोंको थोडासा घी चुपडकर, अग्निपर रख दें, जब वे झुलसने लगें तो त्वरित निकालकर निचोड लें ! इस रसको थोडी उष्ण अवस्थामें ही कानमें डालनेसे तीव्र तथा बहुविधि वेदनायुक्त कर्णशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है ।

– आकके पीले पके हुए, बिना छेदवाले पत्तोंपर घी लगाकर अग्निमें तपाकर, उसका रस कानमें दो-दो बून्द डालनेसे लाभ होता है ।

* आक और नेत्ररोग :

– अर्क मूलकी छाल १ ग्राम कूटकर, २० ग्राम ‘गुलाब’जलमें ५ मिनटतक रखकर छान लें ! बूंद-बूंद आंखोंमें डालनेसे (३ बूंदसे अधिक न डालें) नेत्रकी लाली, भारीपन, पीडा, कीचकी अधिकता और खुजली दूर हो जाती है ।

– अर्कमूलकी छालको जलाकर कोयला कर लें और इसे थोडेसे जलमें घिसकर नेत्रोंके चारों ओर तथा पलकोंपर धीरे-धीरे मलते हुए लेप करें, तो लाली, खुजली तथा पलकोंकी सूजन आदि मिटती है ।

– आंख दुखनेपर, यदि बाईं आंख हो और उसने भारी पीडा और वेदना हो तो दाहिने पांवके नखोंको तथा यदि दाईं आंखमें पीडा हो तो बाएं पांवके नखोंको आकके दूधसे गीला कर दें ! सावधान रहना अति आवश्यक है कि आकका दूध आंखमें नहीं लगना चाहिए; नहीं तो परिणाम भयंकर रूप धारण कर सकता है । यह एक चमत्कारिक प्रयोग है ।



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