घरका वैद्य – दुग्ध चिकित्सा (भाग-१)


इसमें सन्देह नहीं है कि ज्यों-ज्यों हमारा आहार सम्बन्धी ज्ञान बढता जा रहा है, त्यों-त्यों हमारे आहारमें होनेवाली चूकोंके साथ-साथ कई छोटी-बडी व्याधियां भी उत्पन्न होती जा रही हैं । यदि भोजनमें थोडा सुधार कर लिया जाए एवं प्राकृतिक चिकित्साका आधार लिया जाए तो कई रोगोंका निवारण भी हो सकता है एवं हम नीरोगी रह सकते हैं ।
  दुग्ध चिकित्सा भी प्राचीनकालसे ही प्रचलित चिकित्सा प्रणाली है, जिससे अनेक रोगोंका निवारण किया जा सकता है । इस सम्बन्धमें हमने कुछ बातें हमारी मासिक पत्रिकाके पिछले अंकमें जानी और इस अंकमें इसी क्रममें हम कुछ और तथ्य जानेंगे । यह बहुत पहले ही स्वीकार कर लिया गया था कि दूधमें रोगोंको नष्ट करनेकी शक्ति विद्यमान है । गायके दूधको नाडीकी दुर्बलता नष्ट करनेके लिए सर्वश्रेष्ठ कहा गया है । यह वायु, पित्त और रक्तकी अशुद्धिमें भी गुणकारी है; इसलिए पेटके रोगोंमें अधिकतर प्राकृतिक चिकित्सक दुग्ध कल्प करवाते हैं ।
महर्षि चरकके अनुसार, दूध अमृत है ।
दूधमें अनेकानेक पोषक तत्त्व होते हैं, जैसे ‘प्रोटीन’, ‘कार्बोहाइड्रेट’, ‘लैक्टिक एसिड’, ‘लैक्टोज’, खनिज लवण, वसा, ‘विटामिन ए, बी, सी, डी और ई’ सभी होते हैं । यह शरीरका निर्माण, संरक्षण और पोषण हेतु अमृततुल्य हैं । यदा-कदा हम समाचार पत्रमें पढते हैं कि दूधसे कर्करोग अर्थात कैंसर हो रहा है; इसलिए दूध नहीं पीना चाहिए । इसका कारण है, विदेशी गायका दूध या ‘ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन’ देकर पशुओंसे निकाला जानेवाला दूधका प्रयोग । विदेशी गायका दूध (A1 प्रकारका दूध) नहीं पीना चाहिए । इसपर अब अनेक देशोंमें शोध हो चुका है और यह सिद्ध हो चुका है कि वह दूध अनेक रोगोंका जन्मदाता है । साथ ही ‘इंजेक्शन’में जो रसायन होते हैं, वे भी दूधमें तुरन्त पहुंच जाते हैं और दूधको विषाक्त बना देते हैं, ऐसे दूधसे तो हमें निश्चित ही दूर रहना चाहिए । देशी गायका दूध तो रामायण और महाभारतकालसे पीया जा रहा है और यह एक सम्पूर्ण आहारके रूपमें जाना जाता है ।


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