घरका वैद्य – जल तत्त्वद्वारा प्राकृतिक चिकित्सा (भाग-२)
जल तत्त्वकी उत्पत्ति : ‘जल’की उत्पत्ति कैसे हुई ?, इस प्रश्नके उत्तरके लिए हमें ‘पुराणों’का आधार लेना होगा । पुराणोंका इसलिए; क्योंकि ‘पुराण’ ही वे ग्रन्थ हैं, जिनमें जगतके सृष्टि-विषयक प्रश्नपर विशद रूपसे विचार किया गया है । प्रायः सभी पुराण इस मतपर स्थिर हैं कि जगतकी सृष्टि इस क्रममें हुई है –
१. प्रधान (प्रकृति) और पुरुषके संयोगके कारण सर्वप्रथम महतत्त्व अर्थात त्रिगुण उत्पन्न हुआ ।
२. ‘महतत्त्व’, सात्त्विक, राजस और तामस – तीन प्रकारका होता है । यह ‘प्रधान’से आवृत्त (ढका हुआ) रहता है ।
३. महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), तेजस (राजस) और भूतादि रूप (तामस) अहङ्कार उत्पन्न हुआ ।
४. यह अहङ्कार त्रिगुणात्मक (सात्त्विक, राजस और तामस) होनेके कारण ‘भूत’ (पंचतत्त्व) और इन्द्रिय आदिका जनक है ।
५. यह अहङ्कार त्रिगुणसे व्याप्त रहता है ।
६. तामस अहङ्कारके विकृत होनेपर ‘शब्द-तन्मात्रा’ और ‘शब्द’ गुणवाले आकाशकी उत्पत्ति हुई ।
७. यह शब्द तन्मात्रावाला ‘आकाश’ तामस अहङ्कारसे व्याप्त होनेके कारण स्पर्श ‘तन्मात्रा’की उत्पत्तिका कारण बना अर्थात स्पर्श गुणवाला ‘वायु’ उत्पन्न हुआ ।
८. वायु तत्त्व आकाशसे ‘आवृत्त’ रहता है; अतः इन दोनोंके (शब्द और स्पर्श तन्मात्राओंके) संयोगसे ‘रूप तन्मात्रा’ तथा रूप व गुणवाले ‘तेज’की उत्पत्ति हुई ।
९. ‘तेज’ स्पर्श तन्मात्रासे आवृत्त रहता है; अतः आकाश, वायु और तेजके संयोगसे ‘रस तन्मात्रा’ तथा रस गुणवाले ‘जल’की सृष्टि हुई ।
१०. रस तन्मात्रा तेजसे आवृत्त रहती है; अतः उसमें जब विकार हुआ तो आकाश, वायु, तेज और जलके संयोगसे गन्ध ‘तन्मात्रा’ तथा गन्ध गुणवाली पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई ।
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