घरका वैद्य – जलतत्त्वद्वारा प्राकृतिक चिकित्सा (भाग-७)


ठण्‍डे जलसे स्‍नानका चिकित्‍सकीय लाभ
जलके अनेक नाम हैं, जैसे पानीय, सलिल, नीर, कीकाल, जल, अम्‍बु, आप, वारी, वारिक, तोय, पय, पाथ, उदक, जीवन, वन, अम्‍भ, अर्ण, अमृत और धन, रस आदि । इन नामोंमें जलका नाम जीवन अमृत होना इस बातकी ओर सङ्केत करता है कि प्राणियोंका जीवन धारण करना जलपर ही अवलम्बित है अथवा जल प्राणियोंका प्राण है ।
वेदोंमें जलके गुणोंकी प्रशंसा और जलद्वारा रोग निवृत्तिके वर्णन स्वरूप अनेक ऋचाएं हैं ?, उनमेंसे एक
इस प्रकार हैं :
आप इद्धा उ भेषजोरापो अभीव चातनी: । 
आपस सर्वस्‍व भेषजोस्‍तास्‍तु कृणवन्‍तु भेषजम् ऋगवेद ०९०:१३६:६
अर्थ: जल ही औषधि है, जल रोगोंका शत्रु है, यह सभी रोगोंका नाश करता है; इसलिए यह तुम्हारा भी रोग दूर करे ।
जल, प्राण-रक्षाके लिए प्रसिद्ध पञ्चतत्त्वों, सगुणसे निर्गुणके क्रममें दूसरा तत्त्व है ।  यह जीवनके लिए उतना ही आवश्यक है, जितना श्वास लेनेके लिए वायु । हमारे शरीरके भारके सौ भागोंमें ७० भाग केवल जल है अर्थात हमारी आंखोंमें ९८.७ प्रतिशत, फेफडोंमें ७९ प्रतिशत, रक्तमें ८० %, अस्थियोंमें २५ % और मस्तिष्कमें ९०% जल होता है ।
जलमें अग्निको ग्रहण कर लेनेकी शक्ति है, जिससे रोगोपचारमें बडी सहायता मिलती है । जल अधिक ‘गर्मी’ पाकर भाप बन सकता है और आकाशमें विलीन हो सकता है तथा पुनः वर्षाके रूपमें पृथ्वीपर गिरकर प्राणियोंकी जीवन रक्षाका कारण बन सकता है । जल शीतलताके अधिक होनेपर पत्थरसा हिम बन जाता है । जलमें आग बुझानेकी विशेष शक्ति होती है; इसलिए जलका प्रयोग ज्वरमें सफल होता है । मिट्टी भी आगको बुझा देती है, जो जल और मिट्टीका संयुक्त प्रयोग गीली मिट्टीकी पट्टीके रूपमें शरीरकी बढी हुई ‘गर्मी’को या पित्तको (ज्वर, फोडा आदि रोगोंमें) शान्त करनेमें अत्यन्त प्रभावशाली है ।


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