घरका वैद्य – पारिजात (भाग-२)


प्रकृति – यह हलका, तिक्त, कटु, उष्ण, वात-कफनाशक, ज्वरनाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है । ‘सायटिका’ रोगको दूर करनेका इसमें विशेष गुण है ।
रासायनिक तत्त्व : इसके पुष्पोंमें सुन्धित तेल होता है । रंगीन पुष्प नलिकामें ‘निक्टैन्थीन’ नामक रंग द्रव्य ‘ग्लूकोसाइड’के रूपमें ०.१% होता है, जो केसरमें स्थित ‘ए-क्रोसेटिन’ के सदृश होता है । बीज मज्जासे १२-१६% पीले भूरे रंगका स्थिर तेल निकलता है । पत्तोंमें ‘टैनिक अम्ल’, ‘मेथिलसेलिसिलेट’, ‘ग्लाइकोसाइड’ (१%), ‘मैनिटाल’ (१.३%), एक राल (१.२%), कुछ उडनशील तेल, ‘विटामिन-सी’ और ‘ए’ पाया जाता है । छालमें एक ‘ग्लाइकोसाइड’ और दो क्षाराभ होते हैं ।
आइए, अब इसके औषधीय गुणोंके विषयमें जानते हैं –
‘सायटिका’ रोगमें लाभप्रद : इस वृक्षके पत्ते और छाल विशेष रूपसे उपयोगी होते हैं । इसके पत्तोंका सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोगको दूर करनेमें किया जाता है । इसके लिए इसकी औषधी निम्न ढंगसे बनाई जाती है –
विधि : हरसिंगारके ढाई सौ ग्राम पत्ते स्वच्छ करके एक लीटर जलमें उबालें । जब जल लगभग ७०० मिली शेष रहे, तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और १-२ रत्ती केसर घोंटकर इस जलमें घोल दें ! इस जलको दो बडी बोतलोंमें भरकर प्रतिदिन प्रातःकाल व सन्ध्यामें एक कप मात्रामें पीएं ! ऐसी चार बोतलें पीनेतक ‘सायटिका’ रोग समाप्त हो जाता है । किसी-किसीको शीघ्र लाभ होता है, तदुपरान्त चार बोतल पी लेना अच्छा होता है । इस प्रयोगमें एक बातका ध्यान रखें कि वसन्त ऋतुमें ये पत्ते गुणहीन रहते हैं; अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतुमें लाभ नहीं करता है ।


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