घरका वैद्य – प्राणायाम चिकित्सा (भाग-१)


अनुलोम-विलोम 
‘प्राण+आयाम’से प्राणायाम शब्द बना है । प्राणका अर्थ जीवनी शक्ति है, किन्तु इसका सम्बन्ध शरीरान्तर्गत वायुसे है, जिसका मुख्य स्थान हृदयमें है । व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णतः श्वास छोड देता है । तब सिद्ध हुआ कि वायु ही प्राण है । आयामके दो अर्थ हैं । प्रथम नियन्त्रण या रोकना और द्वितीय विस्तार ।
‘प्राणस्य आयाम: इति प्राणायाम ।’
‘’श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायाम’’
– यो.सू. २:४९
अर्थ : प्राणको आयाम देना, प्राणकी स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वासको रोकना, नियन्त्रण करना या उसका विस्तार करना प्राणायाम है ।
   अनुलोम-विलोम प्राणायाम नासिकाके द्वारा किया जाता है । यह एक सरल; परन्तु अत्यन्त गुणकारी, वायु तत्त्वके माध्यमसे की जानेवाली चिकित्सा प्रणाली है । प्राचीन समयमें ऋषि-मुनि अनुलोम-विलोम प्राणायाम अभ्यासके द्वारा अपनी कुण्डलिनी शक्तियां जाग्रत करते थे । अनुलोम-विलोम प्राणायाम नासिकाके छिद्रोंको क्रमानुसार बाधित करके किया जाता है ।
   अनुलोम-विलोम प्राणायामके निरन्तर अभ्याससे शरीरकी सर्व नाडियोंका शोधन होता है; इसलिए इसे नाडीशोधन प्राणायाम भी कहा जाता है । इससे ध्यान करनेकी शक्तिका अद्भुत विकास होता है । इस गुणकारी प्राणायामको करनेसे शरीरकी शुद्धि होती है एवं इसे करनेके पश्चात शरीरमें स्फूर्ति आती है और एक नूतन ऊर्जाका संचार होता है । अनुलोम-विलोम करनेसे मन प्रफुल्लित हो जाता है तथा मनमें अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं । यह प्राणायाम व्यक्तिमें सकारात्मक विचारोंका सृजन करके, उसे आत्मविश्वासी बनाता है ।


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