घरका वैद्य – स्वर चिकित्सा (भाग-४)


स्वरोंसे रोगोपचार
हम आपको पिछले दो अंकोंमें बता ही चुके हैं कि स्वर चिकित्सा सहज, सरल, पूर्णतः निर्दोष, सर्वत्र उपलब्ध, सर्वकालिक, पूर्णतः वैज्ञानिक, स्वावलम्बी, अहिंसक, बिना किसी औषधि एवं वैद्यके स्वस्थ बनानेवाली, प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति है, जिससे बिना किसी दुष्प्रभाव न केवल अच्छा स्वास्थ्य; अपितु जीवनकी विविध समस्याओंका समाधान भी प्राप्त किया जा सकता है । रोगोंके उपचार हेतु, औषधि एवं अन्य चिकित्सा पद्धतियोंके अपेक्षाकृत स्वरयोगसे प्रायः शीघ्र अच्छे परिणाम मिलते हैं । स्वरकी प्रक्रिया बिगडनेसे भी रोग हो जाते हैं; अतः स्वरोंका यथा सम्भव शोधन करते रहना चाहिए ।
आकस्मिक रोग : जब रोगका कारण समझमें न आए और रोगकी असहनीय स्थिति हो तो ऐसे समयमें रोगका उपद्रव होते ही जो स्वर चल रहा है, उसको बन्दकर विपरीत स्वर चलानेसे तुरन्त सहायता मिलती है । शरीरमें विजातीय तत्त्वोंके एकत्रित हो जानेपर एवं सतत उसके निष्कासन न होनेसे प्राण ऊर्जाके प्रवाहमें अवरोध उत्पन्न होने लगता है; परिणामस्वरूप प्रभावित अंग, उपांग, तन्त्र अपनी पूर्ण क्षमतासे कार्य नहीं कर पाते, जिससे शरीर रोगग्रस्त होने लगता है । स्वर सन्तुलनसे प्राण ऊर्जाका प्रवाह पुनः बराबर होनेसे, विजातीय तत्त्व दूर होने लगते हैं तथा व्यक्ति स्वस्थ होने लगता है, असाध्य रोग ठीक होने लगते हैं एवं कभी-कभी शल्य चिकित्साकी भी आवश्यकता नहीं रहती । विजातीय तत्त्वोंके एकत्रित होनेसे जो ग्रन्थि (गांठ) बनती है, वह बिखरने लगती है, निष्क्रिय अंगोंमें प्राण ऊर्जाका प्रवाह आवश्यकतानुसार होनेसे निष्क्रिय अंग पुनः सक्रिय होने लगते हैं; अतः सभी प्रकारके असाध्य एवं संक्रामक रोग स्वर सन्तुलनद्वारा ठीक हो सकते हैं ।
 चन्द्र और सूर्य स्वरके असन्तुलनसे सुस्ती, अनिद्रा, थकावट, चिन्ता आदि सभी रोगोंका जन्म होता है; अतः दोनोंका सन्तुलन और सामंजस्य स्वस्थता हेतु अनिवार्य होता है । लम्बे समयतक रात्रिमें सतत चन्द्रस्वर चलना और दिनमें सूर्य स्वर चलना, रोगीके अस्वस्थ्यताका सूचक होता है । निरन्तर चलते हुए सूर्य या चन्द्र स्वरके परिवर्तनके सारे उपाय करनेपर भी यदि स्वर न परिवर्तित हो तो रोग असाध्य होता है तथा उस व्यक्तिकी मृत्यु समीप होती है । दोनों स्वरोंके प्रवाहकी अवधिमें जितना अधिक असन्तुलन होता है, उतना ही व्यक्ति अस्वस्थ अथवा रोगी होता है । सङ्क्रामक और असाध्य रोगोंमें यह अन्तर अत्यधिक बढ जाता है । लम्बे समयतक एक ही स्वर चलनेपर व्यक्तिकी मृत्यु शीघ्र होनेकी आशङ्का रहती है; अतः सजगतापूर्वक स्वर चलनेकी अवधिको समानकर असाध्य एवं सङ्क्रामक रोगोंसे मुक्ति पाई जा सकती है ।


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