घरका वैद्य : तिल (भाग-४)


* अर्श (बवासीर) : तिलके तेलकी बस्ति या ‘एनिमा’ देनेसे गुदाके भीतर, अत्यधिक दूरतक आंते स्निग्ध होकर, मलके गुच्छे निकल जाते हैं, जिससे ‘बवासीर’में लाभ अनुभव होता है ।

* रक्तातिसार :  तिलोंके ५ ग्राम चूर्णमें समान मात्रामें मिश्री मिलाकर, बकरीके चार गुने दूधके साथ सेवन करनेसे रक्तातिसारमें लाभ होता है ।

* आमातिसार : तिलके पत्रोंको जलमें भिगोनेसे, जलमें ‘लुआब’ आ जाता । यह चेप या ‘लुआब’ बच्चोंको पिलानेसे, विसूचिका, अतिसार, आमातिसार, प्रतिश्याय और मूत्र नलीके रोगोंमें लाभ होता है ।

* गर्भाशयके विकार :

– गर्भाशयमें रक्तके जमावको बिखेरनेके लिए ५०० मि.ग्राम तिलोंका चूर्ण, दिनमें ३ से ४ बार सेवन करना चाहिए और उष्ण जलमें बैठना चाहिए एवं जल कटितक (कमरतक) पहुंचना चाहिए ।

– मासिक धर्म यदि कष्टसे आता हो तो तिलोंका १०० मिलीग्राम क्वाथ बनाकर पिलाना चाहिए ।

– तिलके १०० मिलीग्राम क्याथमें २ ग्राम सोंठ, २ ग्राम काली मिर्च और २ ग्राम पीपलका चूर्ण डालकर दिनमें तीन बार पिलानेसे मासिक धर्मकी रुकावट समाप्त हो जाती है ।

– रूईके फाहेको तिलके तेलमें भिगोकर योनिके अग्रभागपर रखनेसे श्वेत प्रदर मिट जाता है ।



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