घरका वैद्य : तिल (भाग- ५)


* बच्चोंका मूत्ररोग : रात्रिमें बच्चे शैय्या गीला कर देते  हैं, उनके लिए तिलका लम्बे समयतक सेवन बहुत     लाभकारी है ।

– १० ग्राम तिल और १० ग्राम गोखरूको रातभर पानीमें भिगोकर, प्रातःकाल उनका चेप निकालकर, उसमें थोडासा गुडका बूरा डालकर पिलानेसे, बन्द हुआ मासिक धर्म पुनः नियन्त्रित हो जाता है ।

– तिलको तेलमें पीसकर, नाभिके नीचे लेप करनेसे, शीत ऋतुके कारण हुई नाडियोंकी पीडा मिटती है ।

– मासिकधर्मको नियमित करनेके लिए, तिलोंका चूर्ण आधा ग्रामकी मात्रामें, दिनमें ४ बार जलके साथ लेनेसे ऋतुस्राव नियमित हो जाता है ।

– तिलका काढा बनाकर, लगभग १०० मिलीग्राम, प्रातः एवं सायं पीनेसे मासिक धर्म नियमित हो जाता है ।

* पुरुषार्थ : तिल और अलसीका १०० मिलीग्राम क्वाथ प्रातःकाल और सायं भोजनसे पूर्व पिलानेसे पुरुषार्थ               बढता है ।

* पथरी :

– तिलकी छायावाली दिशामें, शुष्क कोमल कोपलोंकी राख, दस ग्रामकी मात्रामें प्रतिदिन खानेसे पथरी गलकर निकल जाती है ।

– तिलके पुष्पोंके ४ ग्राम क्षारको और दो चम्मच मधुको २५० ग्राम दूधमें मिलाकर पिलानेसे पथरी गल जाती है ।



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