आयुर्वेद अपनाएं स्वस्थ रहें (भाग – २२.१)


गिलोय (संस्कृत नाम – गुडूची, ज्वरअरिः, छिन्ना, जीवन्ती; अंग्रेजी नाम – टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया; अन्य नाम – अमृता, छिन्नरुहा, चक्रांगी), एक बहुवर्षिय लता होती है । इसके पत्ते पानके पत्तोंकी भांति होते हैं । गिलोयकी लता वन, खेतोंकी मेड, पर्वतों आदि स्थानोंपर सामान्यतः कुण्डलाकार चढती पाई जाती है, यह नीम और आम्रके वृक्षोंके आस-पास भी मिलती है । जिस वृक्षको यह अपना आधार बनाती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं । इस दृष्टिसे नीमपर चढी गिलोय (नीम-गिलोय) श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है । यह वात, कफ और पित्त नाशक होती है । यह निर्धनके घरकी चिकित्सक है, क्योंकि यह गांवोंमें सहजतासे मिल जाती है । यह इतनी अधिक गुणकारी होती है कि इसका नाम ‘अमृता’ रखा गया है । आयुर्वेदमें गिलोयको किसी भी प्रकारके ज्वरकी एक महान औषधिके रूपमें माना गया है ।
घटक – पत्तियोंमें ‘कैल्शियम’, ‘प्रोटीन’, ‘फास्फोरस’, ‘सोडियम सेलिसिलेट’ और तनेमें ‘स्टार्च’ भी मिलता है ।
सेवन विधि – गिलोयके तनेको जो अधिक कडा नहीं होता है, उसे तोडकर दातुनकी भांति उसका रस चूसा जा सकता है, गिलोयके तने व पत्ते जलमें उबालकर क्वाथ (काढा) बनाकर पिया जा सकता है । इसके अतिरिक्त गिलोयकी अनेक गोलियां (टेबलेट) व रस औषधिके रूपमें मिल जाते हैं, जिनका सेवन चिकित्सककी परामर्शसे किया जा सकता है ।
आइए, आज आपको गिलोयसे होनेवाले लाभोंके विषयमें बताएंगें –
* रोग-प्रतिरोधक क्षमतामें वृद्धि – गिलोयमें शरीरकी रोगप्रतिरोधक क्षमतामें वृद्धिके महत्वपूर्ण गुण पाए जाते हैं । इसमें आक्सीकरण-रोधीके (एंटीऑक्सीडंटके) विभिन्न गुण पाए जाते हैं, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य बना रहता है तथा भिन्न प्रकारके रोग दूर होते हैं । गिलोय यकृत (लीवर) तथा वृक्कमें (किडनीमें) पाए जानेवाले रासायनिक विषैले पदार्थोंको बाहर निकालनेका कार्य भी करती है । यह रोगोंके कीटाणुओंसे लडकर शरीरको सुरक्षा प्रदान करती है ।
* ज्वरमें लाभप्रद – गिलोयसे लम्बे समयतक चलने वाले ज्वरको ठीक होनेमें अत्यधिक लाभ मिलता है । इसमें ज्वरसे लडनेवाले गुण पाए जाते हैं । यह शरीरमें रक्तके ‘प्लेटलेट्स’की मात्राको बढाती है, जो कि किसी भी प्रकारके ज्वरसे लडनेमें उपयोगी है । डेंगू जैसे ज्वरमें भी गिलोयका रस अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है । यदि मलेरियाके लिए गिलोयके रस तथा मधुको (शहदको) समान मात्रामें रोगीको दिया जाए तो बडी सफलतापूर्वक मलेरियाकी चिकित्सा होती है । गिलोयके तने और श्याम तुलसीकी छह-सात पत्तियोंको एकसाथ जलमें उबालकर, जलको आधा होनेपर उसमें मधु (शहद) मिलाकर सेवन करनेसे यह किसीभी प्रकारके ज्वरको तोडनेमें सहायक है ।
* पाचन क्रिया – गिलोयसे शारीरिक पाचन क्रिया भी संयमित रहती है । विभिन्न प्रकारकी उदर सम्बन्धी समस्याओंको दूर करनेमें गिलोय प्रचलित है । इसके लिए यदि एक ग्राम गिलोयके चूर्णको थोडेसे आंवला चूर्णके साथ नियमित रूपसे लिया जाए तो अत्यधिक लाभप्रद होता है ।
* बवासीर – बवासीरसे पीडित रोगीको गिलोयका रस छांछके साथ मिलाकर देनेसे रोगीका कष्ट अल्प होने लगता है ।
* मधुमेह – गिलोयके रसको नियमित रूपसे पीनेसे रक्त शर्कराकी मात्रा अल्प होने लगती है ।
* श्वासरोग (अस्थमा) – यह एक प्रकारका अत्यन्त भयावह रोग है, जिसके कारण रोगीको भिन्न प्रकारके कष्ट, जैसे छातीमें कडापन आना, श्वास लेनेमें बाधा होना, अत्यधिक खांसी होना तथा श्वासका तीव्र गतिसे चलना आदि होते हैं, परन्तु गिलोयके नियमित प्रयोगसे श्वासरोगीको अत्यधिक लाभ मिलता है ।
* नेत्र-ज्योति – गिलोयके कुछ पत्तोंको अच्छेसे धोकर जलमें उबाल लें, यह जल ठंडा होनेपर नेत्रोंकी पलकोंपर नियमित रूपसे लगानेसे अत्यधिक लाभप्रद होता है ।
* सौंदर्यताके लिए – गिलोयका उपयोग करनेसे मुखपर काले धब्बे, कील-मुहांसे अल्प होने लगते हैं । मुखपर झुर्रियां भी न्यून होनेमें सहायता मिलती है । यह त्वचाको युवा बनाए रखनेमें सहायक है ।
* रक्त सम्बन्धित रोग – कई लोगोंमें रक्तकी अल्प मात्रा पाई जाती है, जिसके कारण उन्हें शारीरिक दुर्बलता अनुभव होने लगती है । गिलोयका नियमित प्रयोग करनेसे शरीरमें रक्तकी मात्रा बढने लगती है तथा गिलोय रक्तको स्वच्छ करनेमें अत्यधिक लाभदायक है ।
गिलोयके अन्य लाभोंके विषयमें हम इसी श्रृंखला अन्तर्गत अगले लेखमें जानेंगें ।



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