गुरु अंगद देव


गुरु अंगद देव सिक्ख धर्मके दूसरे गुरु हैं । विक्रमसंवत् अनुसार वैशाख कृष्णपंचमीके दिवस, गुरु अंगददेवजीकी पुण्यतिथि है जो ख्रिस्ताब्द २०१७ में १६ अप्रैलको है । इसी उपलक्ष्यमें हम उनके जीवन चरित्रका सूक्ष्म अवलोकन करेंगे ।
गुरु अंगददेवजीको पंजाबी भाषा, गुरुमुखीका जनक माना जाता है । अंगददेवजीने गुरु नानकके लेखनको संग्रहित करनेके साथ-साथ उनका प्रचार करना भी प्रारम्भ किया । साथ ही उन्होंने अपने अनुभवोंसे कई गीतोंका लेखन किया और लोगोंतक उन्हें पहुंचानेके लिए गुरुमुखी लिपिकी रचना भी की । उन्होंने बच्चोंकी शिक्षामें विशेष रुचि ली । उन्होंने विद्यालय व साहित्य केन्द्रोंकी स्थापना की । नवयुवकोंके लिए उन्होंने मल्ल-अखाडाकी प्रथा आरम्भ की जहांपर शारीरिक ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक सीख भी प्राप्त होती थी ।
गुरुमुखीका तात्पर्य होता है ‘गुरुके मुखसे निकली हुई वाणी’ । गुरुमुखी वह लिपि है जिसमें गुरुग्रन्थ साहिब लिखी गई है । गुरुमुखीकी विशेषता यह है कि यह अत्यन्त सरल और स्पष्ट उच्चारणसे युक्त है । इसका उद्देश्य था इसकी सहायतासे लोग गुरु नानकजीकी शिक्षाओं और उनके भजनोंको समझ सके ।
गुरु अंगददेवजीके नेतृत्वमें ही लंगरकी व्यवस्थाका व्यापक प्रचार हुआ । गुरु अंगददेवजीका मूल नाम, भाई लहनाजी था । एक बार उन्होंने गुरु नानकजीका एक गीत, एक सिक्खको गाते हुए सुन लिया । इसके पश्चात् उन्होंने गुरु नानकदेवजीसे मिलनेका मन बनाया । कहते हैं कि गुरु नानक देवजीसे  प्रथम भेंटमें ही गुरु अंगददेवजीका चरित्र परिवर्तित हो गया और वह सिक्ख पन्थमें परिवर्तित होकर कतारपुरमें रहने लगे । इन्होंने ही गुरुमुखीकी रचनाकी और गुरु नानक देवकी जीवनी लिखी थी ।
गुरु और सिक्ख धर्मके प्रति उनकी आस्थाको देखकर गुरु नानक देवजीने उन्हें दूसरे नानककी उपाधि और गुरु अंगदका नाम दिया । कहा जाता है कि गुरु बननेके लिए नानकजीने इनकी सात परीक्षाएं ली थीं । गुरु नानकजीकी देह त्यागके पश्चात् गुरु अंगद देवजीने उनके उपदेशोंको आगे बढानेका कार्य किया । गुरु अंगद देवजीका देह-त्याग वैशाख कृष्ण पंचमीके दिवस ख्रिस्ताब्द १५५२ को हुआ ।



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