गुरुकी संकल्पशक्तिका महत्त्व


श्री प्रमोद कुमारने ‘यू ट्यूब’में हमारे एक विडियोपर प्रतिक्रिया (कमेन्ट) लिखी है, “मैं आपके हिन्दीके ज्ञानसे अभिभूत हूं ।” उन्हें विनम्रतासे ये तथ्य बताना चाहेंगें –
मेरी शिक्षा अंग्रेजी माध्यममें हुई और हमारे पाठ्यक्रममें मात्र एक विषय हिन्दी साहित्यका होता था ! घरमें हम अंगिका (मैथिली भाषाका अपभ्रंश) बोलते थे; यह अवश्य था कि हामरे पिताजीने हमपर पाश्चात्य सभ्यताको कभी हावी नहीं होने दिया; अतः घरमें हिन्दीमें पत्रिकाएं और समाचारपत्र आते थे, उसे मैं नित्य अवश्य ही पढती थी; किन्तु इससे हमारी हिन्दी भाषापर विशेष कोई प्रभाव नहीं पडता है यह आप सब जानते ही हैं; क्योंकि स्वतन्त्रता पश्चात ‘गीता प्रेस’ एवं ‘सनातन संस्था’के साहित्यको छोडकर अन्य कोई भी साहित्यमें मैंने सातत्यसे विशुद्ध हिन्दीका (संस्कृतनिष्ठ हिन्दीका) प्रयोग नहीं पाया है, यदि आपने कहीं देखा हो तो हमें अवश्य सूचित करें ! मैं व्यैक्तिक स्तरपर वैसे साहित्योंका अवश्य ही अभ्यास करना चाहूंगी और उसे प्रोत्साहन भी देना चाहूंगी ।
  ख्रिस्ताब्द २००० में जब मैं ‘सनातन संस्था’में साधनारत थी तो हमारी एक ज्येष्ठ साधिकाने मुझसे कहा, “परम पूजे गुरुदेव चाहते हैं कि हिन्दी मासिक पत्रिका, सनातन प्रभात, संस्कृतनिष्ठ हिन्दीमें प्रकशित हो ।”
   मेरे पिताजी हमें घरमें अंग्रेजी नहीं बोलने देते थे, अपितु ऐसा कहना उचित होगा कि अंग्रेजीमें बातें करना प्रतिबन्धित था । हां, हमें कठोर अनुशासनमें बडा किया गया था, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं था कि हम अपने पिताजीसे डरते थे; किन्तु वे आदर्शोंके साथ समझौता नहीं करते थे । हमारे मनमें उभरनेवाले प्रश्नोंके वे बहुत प्रेमसे उत्तर देते थे । एक दिवस मेरी एक सखी मेरे घर आई । हम दोनों अंग्रेजीमें बातें करने लगे । उसके जानेके पश्चात मेरे पिताजीने मुझसे पूछा, “आप दोनों अंग्रेजीमें क्यों बात कर रहे थे ?” मैंने कहा, “क्योंकि विद्यालयमें हम इसी भाषामें बात करते हैं; इसलिए उसी भाषामें वार्तालाप करना हमें सहज लगता है ।” उन्होंने कहा, “विद्यालयमें अंग्रेजीमें बात करना वहांका अनुशासन है; किन्तु विद्यालयके बाहर आपने सभी सहपाठियोंसे हिन्दीमें ही बात करना चाहिए; क्योंकि वह हमारी राष्ट्रभाषा है । अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है उसका प्रयोग करना अनुचित है ।” मैंने उनसे कहा , “यदि आपको यह भाषा अच्छी नहीं लगती है तो आप हमें अंगेजी माध्यमके विद्यालयमें क्यों पढा रहे हैं ?” मेरे पिताजी हमें अंग्रेजी चलचित्र नहीं देखें देते थे, अंग्रेजीके समाचारपत्र या पत्रिकाएं घरमें नहीं मंगवाने देते थे, यह उसकी भी प्रतिक्रया थी । मेरी इस शंकाका समाधान करते हुए उन्होंने कहा, “बेटा, इसके दो कारण है, पहला तो यह है कि इस नगरमें हिन्दी माध्यमसे कोई अच्छा विद्यालय नहीं है और दूसरा यह कि यदि कभी आपको अंग्रेजी भाषाकी आवश्यकता पड जाए तो आपको यह न लगे कि काश मेरे माता-पिताने यह भाषा हमें सिखाई होती, मात्र इसलिए आपको अंग्रेजी माध्यमके विद्यालयमें पढाया जा रहा है । एक बात बेटा, सदैव ध्यान रखना, जो अपनी मातृभाषाका सम्मान और संरक्षण नहीं कर सकता वह किसी भी भाषाका सम्मान नहीं कर सकता है; इसलिए अपना सम्भाषण घरमें अंगिका और बाहर सदैव हिन्दीमें ही किया करें । इससे आपकी वाणीकी ओजस्विता बनी ही नहीं रहेगी, अपितु बढेगी भी !” मेरे जीवनमें मेरे श्रीगुरुके प्रवेशसे पूर्व मरे पिताजी ही मेरे आध्यात्मिक और व्यावहारिक आदर्श थे; अतः मैंने उनकी बात गांठ बांध रख ली और यथाशक्ति आजतक उसका पालन करती आ रही हूं । यदि मैं चाहूं तो मां सरस्वतीसे प्रार्थना कर अपने लेखोंको अंग्रेजीमें लिख सकती हूं, इससे मेरे लेखोंको अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर पढा जा सकेगा और अधिक लोगोंको लाभ मिलेगा; किन्तु भाषाकी ओजस्वितावाली पिताजीकी बातको ध्यानमें रखकर सदैव ही टूटी-फूटी हिन्दीमें लिखनेका प्रयास किया है ।
 जब श्रीगुरुने संस्कृतनिष्ठ हिन्दीकी बात कही तो मुझे उनपर बहुत श्रद्धा हुई कि वे हिन्दी भाषिक क्षेत्रसे न होते हुए भी हिन्दीके विषयमें विचार कर रहे हैं, इससे मुझे उनकी व्यापकता ज्ञात हुई । मैंने उनकी आज्ञाका पालन करनेका संकल्प लेकर अपनी हिन्दीमें अपेक्षित सुधार करनेका प्रयास आरम्भ किया । उन्होंने हमें कुछ समय सनातन संस्थाके हिंदी विभागमें भाषा शुद्धिकी भी सेवा दी, एक अंग्रेजी माध्यममें पढी साधिका, हिन्दी भाषाकी कितनी शुद्धि करती होगी यह तो आप समझ ही सकते हैं ! वस्तुत: उन्होंने मुझे उस माध्यमसे भी शुद्ध हिन्दी सीखनेकी सन्धि दी और धीरे-धीरे वे मुझे अपने संकल्प शक्तिसे यह भाषा सिखाने लगें । इससे ही सद्गुरुका सामर्थ्य कितना होता है, यह समझमें आता है !  
   आज भी मेरे लेखनमें व्याकरणकी अशुद्धियां रहती हैं, जिसमें मैं सुधार करनेका सतत प्रयास करती रहती हूं और कुछ वर्तनीकी भी होती है; किन्तु वह अंग्रेजीमें द्रुत गतिसे टंकलेखन करते समय लिप्यन्तरणके (transliterate) कारण, स्वतः ही प्रथम शब्द ले लेता है वह लेखनमें आ जाता है और यदि मैं पुनः लेखको न पढूं तो कुछ वर्तनीकी अशुद्धियां रह जाती है ।
मैं अपने श्रीगुरुको इसलिए पूर्ण पुरुष कहती हूं; क्योंकि उन्होंने धर्मके प्रत्येक क्षेत्रकी शुद्धि की है और यह तो मात्र  कोई धर्मसंस्थापक (पूर्ण पुरुष) ही ऐसा कर सकते हैं । उनके मार्गदर्शन अनुसार हम आचरण कर, अपना जीवन सार्थक कर सकें, यह उनके श्रीचरणोंमें विनम्र प्रार्थना करती हूं ।
अतः श्री प्रमोद कुमार जैसे व्यक्ति जो मेरी हिन्दी भाषाके ज्ञानकी स्तुति करते हैं, उन्हें यह विनम्रतासे बताना चाहूंगी यह मेरे श्रीगुरुके मार्गदर्शन, कृपा एवं आशीर्वादका ही परिणाम है, जिसका बीजारोपण मेरे पिताजीद्वारा बाल्यकालमें किया गया । इसमें मेरी विशेष कोई भूमिका नहीं है; क्योंकि आपको तो ज्ञात ही होगा कि आज संस्कृतनिष्ठ हिंदी सीखने और सिखानेका कोई मंच या माध्यम भारतमें नहीं है ।



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