गुरु या सन्त किसे नहीं मिलते हैं ? (भाग – ३)


अहंकारियोंको गुरु या सन्त नहीं मिलते हैं अपितु ऐसा कहना अधिक उचित होगा कि वे अपने अहंकारके इतने अधीन होते हैं कि वे आत्मज्ञानी सन्तके समक्ष भी झुक नहीं सकते हैं ! स्वयंको श्रेष्ठ समझना, ‘मुझे सब ज्ञात है’, ऐसा समझना, ‘मैं सब शास्त्रोंको पढकर जान लूंगा और स्वयं आत्मसाक्षात्कार कर लूंगा’, ‘मुझे ईश्वरको पाने हेतु किसी मध्यस्थकी आवश्यकता नहीं है’, ‘सभी गुरु ढोंगी होते हैं’, जैसे तर्क देनेवाले अहंकारी लोग गुरु या सन्तको पानेकी पात्रता नहीं रखते हैं !

ध्यान रहे, जैसे औषधिको हमारी आवश्यकता नहीं होती है, अस्वस्थ होनेपर हमें उनकी आवश्यकता होती है, वैसे ही, गुरुको हमारी आवश्यकता नहीं होती है ! यह सच है कि वे अपनी ज्ञानकी थाती किसी योग्य व्यक्तिको देना चाहते हैं; किन्तु ऐसे कितने ही सन्त या गुरु हुए हैं जिन्होंने योग्य शिष्यके न मिलनेपर अपनी ज्ञानकी थाती अपने साथ लेकर या ग्रंथोंमें डालकर चले गए; किन्तु किसी कुपात्रको कुछ भी नहीं दिया ! बारम्बार जन्म और मृत्यु रूपी रोगसे तो हम पीडित हैं; इसलिए गुरुकी हमें आवश्यकता होती है, गुरु तो जीवनमुक्त होते हैं, वे ब्रह्मानंदमें लीन रहते हैं ! इसलिए यदि अहंकारी उनके पास नहीं जाए तो उन्हें अंशमात्र भी अंतर नहीं पडता है ! मैंने कुछ सन्तोंको तो अहंकारी लोगोंको अपने पाससे भगाते हुए भी देखा है ! सन्तका मुख्य कार्य शिष्यके मन और अहंका लय करना होता है, जिससे वे ईश्वरसे एकरूप हो सकें ! यदि कोई अपने अहंको अर्पण ही नहीं करना चाहता हो तो उन्हें सन्त या गुरु कैसे मिल सकते हैं ?, या उनकी कृपा कैसे मिल सकती है ?



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