हमारे श्रीगुरुकी सर्वज्ञता रुपी गुणका बोध करनेवाले कुछ और प्रसंग एवं अनुभूतियां


गुरु संस्मरण

१. मुझे समाजको ज्ञान देना अत्यन्त प्रिय है, यह जाननेवाले मेरे सर्वज्ञ सद्गुरु :  प्रथम दर्शनके दिन जब उनके सत्संग एवं मार्गदर्शनके पश्चात् मैं लौटने लगी, तब वे मुझे और एक साधकको ‘लिफ्ट’ तक छोडने आए और उन्होंने चलते-चलते सहजतासे कहा – “आप सत्संग लेना आरम्भ करें ।” श्रीगुरुसे भेंटसे पूर्व भी अध्यात्मके सम्बन्धमें मुझे जो भी अत्यल्प जानकारी थी, उसे मैं अपने मित्रों और परिचितों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बताया करती थी । मेरी इस विशेषताका भी मेरे श्रीगुरुको ज्ञान था और इसलिए उन्होंने मुझे सत्संग लेनेकी आज्ञा दे दी । सामान्यतः ‘सनातन संस्था’की (मेरे श्रीगुरु जिसके संस्थापक हैं) पद्धति है कि प्रथमतः हम किसी साधकको ‘अध्यात्मका प्रस्तावनात्मक विवेचन’ इस ग्रन्थसे सत्संग लेनेके लिए कहते हैं, जिससे कि व्यक्तियोंको विषय बताते समय साधकको भी अध्यात्मके सारे मौलिक विषय समझमें आ जाएं और उन विषयोंको वह अपने जीवनमें उतार सके; परन्तु मुझे सत्संगमें लेनेके लिए जो प्रथम ग्रन्थ दिया गया, वह था – ‘शिष्य’ । उस समय वह ग्रन्थ मात्र मराठीमें उपलब्ध था; अतः मुझे अंग्रेजीमें भाषांतरितकी हुई ‘जिरॉक्स’ प्रतिलिपि दी गई थी, जिसे पढकर मुझे हिन्दीमें सत्संग लेना था । उस ग्रन्थने मेरे अन्दरके शिष्यत्त्वको निखारनेमें अत्यधिक सहायताकी और उस ग्रन्थमें बताए गए प्रत्येक विषयका मैं अत्यन्त गंभीरतासे अध्ययन कर, उसे जीवनमें उतारनेका प्रयास करने हेतु तन-मन-धनसे प्रयत्न करने लगी; और कुछ ही मासमें यह ध्येय बना लिया कि ५५% आध्यात्मिक स्तर साध्यकर, शिष्य बनना है, जैसा कि उस ग्रन्थमें लिखा था ।
‘५५% आध्यात्मिक स्तर’ यह क्या है ? इस विषयको समझनेके लिए इस लिंकपर जाएं…http://vedicupasanapeeth.org/hn/dharmadhara_staranusaar_/

२.  मेरे बिना बताये श्रीगुरुने मेरी अडचनोंका किया निराकरण : ख्रिस्ताब्द  १९९९ के जून माहकी घटना है, मैं झारखण्ड राज्यके धनबाद नगरमें धर्मप्रसारकी सेवा कर रही थी । उस समय तक वहांपर एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेके लिए सामान्यतः लोकवाहन (ऑटो इत्यादि) नहीं चलते थे । एक दिवस मुझे धनबादसे ३० कि.मी. दूर प्रवचन लेने हेतु जाना था; और वहां जानेके लिए मैं एक यात्रियोंको ले जानेवाली जीपमें बैठ गई । चालकने भेड-बकरी समान लोगोंको उस लोकवाहनमें ठूंस दिया था और साथ ही अत्यधिक गर्मीके कारण सब स्वेदसे(पसीने) भीगे थे और साथ ही बैठे किसी कोयलेकी खदानके श्रमिकने मदिरा पी रखी थी । वह वातावरण मेरे लिए असहनीय था; परन्तु मैं अपने गुरु-कार्य हेतु किसी भी प्रकारके कष्ट उठाने हेतु संकल्पबद्ध थी; अतः मैं अपने मनको उस स्थितिका सामना करने हेतु सिद्ध कर रही थी कि यदि जहां मैं जा रही हूं वहां यदि अच्छे साधक मिले, तो सम्भवतः मुझे साप्ताहिक सत्संग आरम्भ करना होगा और प्रत्येक सप्ताह इसी स्थितिमें जाना होगा और यह सब सहन करते हुए सेवा करना, यह मेरी साधना है । मैं अपने मनको यह दृष्टिकोण देकर समझा रही थी । उस दिवस मैं किसी प्रकारसे प्रवचन लेकर आ गई एवं चार दिवस पश्चात् हमारे एक जयेष्ठ साधकका गोवासे दूरभाष आया कि श्रीगुरु उनसे पूछ रहे थे कि तनुजा, धनबादमें किस प्रकारसे प्रसार करती है, उसके पास कोई वाहन है या नहीं; अन्यथा उसे त्वरित गोवासे दुपहिया वाहन धनबाद भिजवा दिया जाए, जिससे उसे प्रसारमें कोई बाधा न आए । उनकी बात सुन, मेरे नेत्रोंमें अश्रु भर आए और कुछ दिवस पूर्वका सर्व वृतान्त मैंने उन्हें बताया । वे भी यह सुनकर आश्चर्यचकित और आनन्दित हो गए एवं उन्होंने अगले ही दिवस दुपहिया वाहन वहांसे भिजवा दिया । अभी कुछ दिन पहले एक पत्रकार मुझसे पूछ रहे थे कि स्त्री होते हुए धर्म-प्रसार करनेमें आपको किस प्रकारकी अडचनोंका सामना करना पडा, तब मैंने उन्हें यह प्रसंग बताया, जब हम परमेश्वर-समान सर्वज्ञ सद्गुरुकी छत्र-छायामें सेवा करते हैं, तब हमें अडचनोंका सामना अधिक नहीं करना पडता है । (२०.१०.२०१२)
३. जब मेरे कुटुम्बका भी उन्होंने बिना कहे रखा ध्यान : परम पूज्य भक्तराज महाराजका (हमारे श्रीगुरुके गुरु) एक भजन है । उन्होंने कहा है “गृहस्थीकी सारी चिन्ताएं श्रीगुरु चरणोंने ली ।” वैसे ही मेरे श्रीगुरुने भी मेरे बिना बताए, मेरे कुटुम्बके(परिवार) सभी सदस्योंका उत्तम प्रकारसे सदैव ध्यान रखा, इस सन्दर्भमें एक अनुभूति बताती हूं । फरवरी १९९९ में हमारे निकटतम कुटुम्बके एक सदस्यको कुछ शारीरिक कष्ट होने लगा, चिकित्सकको भी दिखाया; परन्तु कुछ विशेष समाधान नहीं मिल पाया । सितम्बर १९९९ में श्रीगुरुके दर्शन एवं सत्संग हेतु गोवामें थी  । मैंने श्रीगुरुसे उस सदस्यके कष्टके सम्बन्धमें एक बार भी कुछ नहीं कहा या यूं कहें, मुझे उसके बारेमें कुछ ध्यान ही नहीं आया, जबकि वह मेरी अत्यधिक प्रिय है; परन्तु जब मैं जाने लगी, तब उन्होंने उसके लिए काजूकी एक पोटली (पैकेट) प्रसादके रूपमें दी और उसे देनेके लिए कहा । उसके विषयमें मैंने श्रीगुरुको कभी कुछ बताया भी नहीं था और उस प्रसादको ग्रहण करनेके पश्चात् वह पूर्णतः स्वस्थ हो गई अर्थात् मात्र मेरे ही विषयमें नहीं, अपितु मेरे कुटुम्बके सभी सदस्योंके विषयमें उन्हें सर्वज्ञात है और उन्होंने सदैव ही सबका ध्यान भी रखा, वह भी मेरे बिना बताए और जब भी, जो भी आवश्यक रहता है, वे उनके लिए स्थूल एवं सूक्ष्मसे करते भी हैं; अतः मैं उनके ओरसे सदैव ही निश्चिन्त रहती हूं ।
४. समाचार पत्र पुनः पढनेकी उन्होंने दी आज्ञा : मैं आठवीं कक्षासे ही समाचार पत्र पढकर, उसके महत्वपूर्ण विषयको काटकर रखा करती थी, जिससे कि भविष्यमें प्रतिस्पर्धावाली परीक्षामें किसी भी सामयिक विषयपर बता सकूं या लिख सकूं । ख्रिस्ताब्द १९९७ के अगस्त महीनेमें सायन आश्रमके एक साधकने हमें तीन ध्वनिचक्रिका अर्थात् ऑडियो कैसेट सुननेके लिए दिए, जिसमें श्रीगुरुके प्रवचन थे । उसमें एक स्थानपर श्रीगुरुने बताया कि मैंने जब साधना आरम्भ की, तो जो भी समय मैं समाचार-पत्र पढनेके लिए देता था, उस समयका सदुपयोग नामजपके लिए करने लगा; क्योंकि मेरे पास समयका अभाव था । ख्रिस्ताब्द १९९७ में मैं भी अत्यन्त व्यस्त रहा करती थी; क्योंकि मैं अपना व्यवसाय भी सम्भालती थी, पढाई भी करती थी; अतः मैंने भी समाचार-पत्र बन्द करवा दिए और उस समयका सदुपयोग नामजपके लिए करने लगी । आठवीं कक्षासे लेकर ख्रिस्ताब्द १९९७ के अगस्त महीने तक भारत और विश्वमें क्या हो रहा है ?, उनका अत्यन्त सूक्ष्मतासे अध्ययन किया करती थी और अकस्मात् ही सब कुछ छोड देनेपर भी, मेरे मनमें न ही इसके विषयमें कोई विचार नहीं आते थे और न ही समाचार-पत्र पढनेकी ही इच्छा होती थी !
मुझे आध्यात्मिक प्रगति करनी है, यही मेरे जीवनका मूल लक्ष्य है, मात्र इसीपर मेरा ध्यान केन्द्रित रहा करता था और उस पथपर अग्रसर होने हेतु, मेरे श्रीगुरु मेरे आदर्श थे । सितम्बर १९९९ में मैं जब गोवा आश्रम गई थी, तब एक दिन श्रीगुरुने अत्यन्त सहजतासे कहा, ‘‘अब आप समाचार-पत्र पढना आरम्भ कर दें, समाजको सामयिक विषयोंपर योग्य दृष्टिकोण देनेके लिए समाचारपत्रका अभ्यास आवश्यक है, तबसे गुरु आज्ञापालन मानकर प्रतिदिन समाचारपत्र पढती हूं ।”  मैंने समाचारपत्र पढना छोड दिया है, यह बात मात्र मैं जानती थी, अन्य किसीको यह ज्ञात नहीं था । उनकी यह बात सुन, मैं उनकी ओर देखने लगी, तो वे मन्द-मन्द मुस्कराने लगे, जैसे कह रहे हों, ‘‘देखती क्या हैं ? मुझे सब ज्ञात है !”

५. श्रीगुरुने अपने मौनसे मिटा दिए मेरे मनमें उभरनेवाले सैकडों प्रश्न : बाल्यकालसे मेरे मनमें अध्यात्म एवं धर्म-विषयक अनेक प्रश्न उभरा करते थे और मुझे उनके  सन्तोषजनक समाधान नहीं मिल पाते थे । कई बार मैं अपने पितासे उत्तर पाने हेतु प्रश्न पूछा करती थी और वे अपनी ओरसे मेरी शंकाओंका समाधान करनेका प्रयास करते थे । मेरे पिता एक नम्र एवं साधक वृत्तिके सद्गृहस्थ थे । वे मां दुर्गाके उपासक थे और मेरे गुरुके दर्शनके पूर्व, वे ही मेरे आदर्श थे । कभी-कभी जब उनके दिए हुए प्रश्नोंके उत्तरसे मैं सन्तुष्ट नहीं होती तो वे मेरे मनके भाव पढ लेते और उत्तरको और स्पष्ट कर, बतानेका प्रयास करते । एक दिवस मेरे किसी प्रश्न पूछनेपर उन्होंने सहजतासे कहा, “अपनी भक्ति बढाओ ! एक दिवस तुम्हारे जीवनमें कोई आएगा जो तुम्हारे सारी शंकाओंके समाधान कर देगा ।” उनकी वाणी सत्य सिद्ध हुई, मेरे जीवनमें श्रीगुरुका पदार्पण हुआ और सचमें मेरी सारी शंकाओंका समाधान हो गया !
मैं ‘सनातन संस्था’के सत्संगमें शंका-समाधान हेतु गई थी; परन्तु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि श्रीगुरुके दर्शनके उपरान्त मेरे मनमें शंका रही ही नहीं ! संस्थाकी साधना पद्धति अनुसार, हमारे प्रमुख साधक, हमारे साधना सम्बन्धित मार्गदर्शन हेतु, हम जिस केन्द्रमें हम सेवारत होते, वहां आया करते थे । तब मेरे सामने एक ही समस्या हुआ करती थी कि इनसे क्या प्रश्न पूछें ?
जिस दिवस मैंने गुरुके प्रथम दर्शन किए, उस दिवससे ही मेरे मनमें प्रश्न उभरने प्रायः समाप्त हो गए और यदा-कदा कभी प्रश्न आ भी जाते थे तो किसी न किसी माध्यमसे त्वरित ही मेरे प्रश्नोंके सन्तोषजनक उत्तर मिल जाते थे; अतः मार्गदर्शकोंसे प्रश्न पूछना मेरे लिए एक समस्या हो जाती थी !
आदिगुरु शंकराचार्यने दक्षिणामूर्ति स्तोत्रमें कहा है, “गुरोऽस्तु मौनं व्याख्यानम् । शिष्यऽस्तु छिन्नसंशय:” ।। अर्थात सद्गुरुने मौनसे शिष्यको सब सिखाया और उसकी शंकाओंका समाधान किया । ईश्वर कृपासे मुझ अधमको इस तत्त्वकी अनुभूति मिली और इससे शास्त्रोंमें बताई गई तत्त्वोंकी सत्यताकी प्रतीति प्रत्यक्षमें मिली ।
  मई २००४ में परम पूज्य गुरुदेवके सानिध्यमें गोवा-स्थित रामनाथी आश्रममें थी । (हिन्दी-भाषिक होनेके कारण, हमारे अध्यात्म-प्रसारका क्षेत्र उत्तर भारत हुआ करता था और वर्षमें एक बार, वह भी कुछ दिवसोंके लिए हमें गोवामें, जहां हमारे श्रीगुरु विराजते थे, वहां जाना होता था) । इसी मध्य एक दिवस अकस्मात् मुझे ध्यानमें आया कि मेरे मनमें कोई प्रश्न क्यों नहीं आते हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरी अध्यात्म सीखनेकी जिज्ञासा अल्प हो रही है ? सौभाग्यसे यह विचार जब आया, तब मैं श्रीगुरुके कक्षके पास ही थी, मेरे मनमें आत्मग्लानि होने लगी; क्योंकि बाबाका (परम पूज्य भक्तराज महाराजका अर्थात् श्रीगुरुके गुरु) एक सुप्रसिद्ध सुवचन है – “जिज्ञासु ही ज्ञानका खरा अधिकारी है ।” मुझे लगा मेरा लक्ष्य ईश्वरप्राप्ति है; किन्तु मुझमें साधकका मूलभूत गुण (जिज्ञासा) है ही नहीं, तो मेरी आध्यात्मिक प्रगति कैसे होगी ? मैंने सोचा, ‘‘परम पूज्य गुरुदेवसे त्वरित ही जाकर अपने इस दोषके विषयमें बताती हूं ।” मैंने डरते एवं संकोच करते हुए, उनके कक्षमें जाकर उन्हें अपनी शंका बताई । श्रीगुरु मुस्कुराते हुए बोले, ‘‘चलो अच्छा है, आप शब्दातीत माध्यमसे सब सीख सकतीं हैं ।” उनका वह सुवचन मेरे कानोंमे बहुत देर तक गूंजता रहा और मैं आनन्दित होती रही । इस घटनाके कुछ दिवस उपरान्त मुझे ध्यानमें आया कि जबसे प्रथम श्रीगुरुसे साक्षात्कार हुआ था एक तो प्रश्न उभरनेका प्रमाण न्यून हो गया था और प्रत्येक बार मैं श्रीगुरुसे प्रश्न पूछने हेतु प्रश्न सोचती थी; परन्तु सदा ही उनके पास जानेके पूर्व ही या तो स्वयं ही प्रश्नके उत्तर किसी-न-किसी माध्यमसे मिल जाया करते थे अथवा वे स्वयं ही बिना पूछे, सारे प्रश्नोंके उत्तर दे देते थे । – तनुजा ठाकुर



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